शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

(“षष्टमोल्लास” ७३/७५)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ७३/७५)
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*सवा चारि से रहती संगा,*
*अकेले वन में फिरौ कुढंगा ।* 
*मुजरा करते सकल हजूरी,*
*उनको त्याग आये वन दूरी ॥७३॥* 
सवा चार सौ राणियां आपके साथ रहती थी, अब आप वन में अकेले बेढंगे अस्त व्यस्त फिरते हो । दिन में राजसभा मंत्री आदि आकर प्रणाम अभिवादन करते थे और जाते समय भी करते थे । दिन भर नर समूह आपके पास रहता था अब आप उन सबको त्यागकर दूर वन में चले तो गये किन्तु आप इस भयंकर वन में अकले कैसे रह सकेंगे ॥७३॥ 
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*मांहि रकेवी कंचन थारू,*
*तामैं करि भोजन भरतारू ।* 
*ठंडा सोरे पीजे नीरू,*
*हुते मूक क्यूं पिय बलवीरू ॥७४॥* 
हे राजन् आप स्वर्ण थाल में अनेकों चांदी की कटोरियों में स्वादिष्ट अनेक व्यंजनों का भोजन कर ठंडा सुराही का जल पीते थे वह अब वन में कहां से पाओंगे हे बलवीर पति आप चुप क्यों हो गये बोलते क्यों नहीं ॥७४॥ 
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*षट् रस व्यंजन पाऊ रसोई,*
*कौन राव उसूल अब होई ।* 
*खुली समाधि न नेत्र खोले,*
*मुख सौं नृप कछु नहीं बोले ॥७५॥* 
हे पति आप रसोई में षट् रस युक्त भोजन पाते थे खाते थे अब इस वन में आपका कौन सा उसूल नियम है । राजा की समाधि खुल गई लेकिन उन्होंने नैत्र नहीं खोले और राजा ने मुख से भी कुछ नहीं बोला ॥७५॥
(क्रमशः)

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