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*अविनाशी के आसरे, अजरावर की ओट ।*
*दादू शरणैं सांच के, कदे न लागै चोट ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ काल का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सोच पर्यो अति यह विचारत,*
*होय इसो पति मोर सुता को ।*
*प्राण बिना करिये उर में यह,*
*नीच बुलाय लिये सउ१ ताको ॥*
*आरण२ चाल गये छवि देख रु,*
*जोनि जरैं हम सोच हु ताको ।*
*मारत हैं अब कौन सहायक,*
*बाहन मैं कर नैन जु ताको ॥५७॥*
धृष्टबुद्धि के मन में बड़ी चिन्ता हो गई । वह विचारने लगा- मेरी पुत्री का पति ऐसा हो, यह अनुचित है । फिर उसने अपने हृदय में निश्चय किया, इसको मरवा देना चाहिये । उसने नीच व्याधों को बुलवाया और उनके मुखिया को कहा- इस लड़के को मार१ कर इसका अंग विशेष लाकर मुझे दिखाओ ।
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व्याध उसे वन२ में ले गये किन्तु उसकी अनुपम छवि देखकर उनको विचार हुआ- हमने पहले पाप किया है तब तो इस नीच योनि में आकर सदा दुःखाग्नि में जल रहे हैं । अब इस निरपराध बालक को मार कर इससे भी हीन योनि में ही जन्म कर दुःख भोगेंगे । किन्तु करते क्या उनको तो धृष्टबुद्धि की आज्ञा थी । व्याध बालक से बोले- अब तेरे को मारते हैं तेरा सहायक कौन है । तब बालक ने धैर्य पूर्वक उनको कहा- मैं जब अपने नेत्रों से तलवार बाहने का अर्थात् गर्दन पर चलाने का संकेत करूं तब मेरा शिर काट देना ।
(क्रमशः)

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