रविवार, 20 दिसंबर 2020

*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ९/१२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ९/१२*
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जगजीवन मांगै भगति, मींठा५ हरि का नांम ।
मीठी संगति साधु की, जा थैं परसै रांम ॥९॥
(५. मींठा=मधुर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम प्रभु से अति मीठा प्रभु का जो नाम है की ही याचना करते हैं वह ही भक्ति हमें देवें और सबसे मीठी संगति साधु जन की है जिससे हमें प्रभु मिल सकते हैं कि क्योंकि भगवान को साधु जन प्रिय हैं ।
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जगजीवन मांगै भगति, मुकति न मांगै दास ।
जा थैं जीव निचिति१ रहै, सोई पिंजरि प्यास२ ॥१०॥
(१. निचिति=निश्चिन्त) {२. पिंजरि प्यास=पिण्ड में(या हृदय में)इच्छा}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु यह दास तो सिर्फ भक्ति की ही याचना करता है, हमें मोक्ष नहीं वांछित है, भक्ति से जीव निश्चय ही आपके सानिध्य में रहेगा, व राम भजन की तृषा बनी रहेगी ।
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भगति अखंडित एक रस, सेवग जाचै पाइ ।
कहि जगजीवन इहै दत्त३, सद्गुरु दीजै आइ ॥११॥ 
(३. दत्त=दान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भक्ति निरतंर समान आनंद दायक हो तब ही सेवक जो जैसा चाहता है वैसा ही पाता है संत कहते हैं कि सद्गुरु महाराज आकर यह ऐसी भक्ति ही दान बक्शे ।
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रांम भगति दीदार४ दत्त, यहु बित५ आवै आथि ।
तो जगजीवन लीजिये, हरि भजि कीजै हाथि ॥१२॥
{४. दीदार=दर्शन(=साक्षात्कार)} {५. बित=वित्त(अमूल्य धन-सम्पत्ति)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु दर्शन रुपी ही धन दीजिए जो कभी समाप्त ही नहीं होता है । और इसे प्राप्त करने का साधन हरि भजन स्मरण ही है ।
(क्रमशः)

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