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*दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध ।*
*कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*स्वांग का अंग १३२*
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कली कपट को चाहिये, कंचन कली न होय ।
रज्जब स्वांगी साधका, इहै१ पटंतर२ जोय३ ॥६९॥
कलई तो कपट के लिये ही चाहिये, सत्य के लिये नहीं । ताँबा को सुवर्ण दिखाते हैं तब सुवर्ण की कलई करते हैं, सुवर्ण पर तो कलई नहीं होती । यहाँ१ स्वांगी साधु को भी कंचन-कलई के समान२ ही देख३, असाधु को साधु दिखाने के लिये ही साधु का भेष बनाया जाता है, सच्चे साधु के लिये भेष की आवश्यकता नहीं ।
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जन रज्जब शुध१ गाय के, कंठ न बाँधै काठ ।
डींगर२ तिस के मेलिये, जो ताके३ बारह४ बाट ॥७०॥
शुद्ध१ अर्थात खेतों में न जाने वाली गाय के कंठ में काष्ठ२ नहीं बाँधते । चलने पर पैरों के लगने वाला काष्ठ उसी गाय के बाँधते है, जो खेतों में जाने के लिये इधर उधर३ देखती४ है ।
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बहुत स्वांग गणिका करे, जाके पुरुष अनेक ।
पतिव्रता सादी भली, रज्जब समझ विवेक ॥७१॥
जिसके अनेक पुरुष होते हैं वह वेश्या ही बहुत ही भेष बनाती है, पतिव्रता तो सादे भेष वाली भी अच्छी है, वैसे ही विवेक द्वारा समझ, जो असंत है वही नाना भेष रूप ढोंग करता है । सच्चे संत तो सादे भेष में ही रहते हैं ।
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जन रज्जब देही दरश१, मनोवृत्ति नहिं जाय ।
देखि दिवाली चित्रिये, अतिगति२ गोधे३ गाय ॥७२॥
देखो, दिवाली के अवसर पर गाय बैलों३ को अत्यधिक२ चित्रित किया जाता है उससे उनके व्यवहार में अंतर आता है क्या ? वैसे ही शरीर पर भेष१ बनाने से मन की वृत्ति प्रभु की और नहीं जाती ।
(क्रमशः)

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