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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ६३/६५)
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*॥ सूरातन ॥*
*दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ ।*
*अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥६३॥*
कुछ लोग धन परिवार आदि को त्याग कर साधुवेश धारण करते हुए काम क्रोधादिकों पर विजय पाने के लिये यत्न करते हैं । परन्तु वे विजयी नहीं हो सकते, कारण कि उनके मन में उनकी आसक्ति बनी रहती है । किन्तु जो स्त्री पुत्रादिकों को न त्याग कर केवल उनकी आसक्ति को त्याग देते हैं तथा घर में अनासक्तभाव से रहते हैं तथा काम क्रोधादि शत्रुओं से दिन रात लड़ते हैं वे ही उन पर विजय पाकर त्यागी कहलाते हैं । परन्तु ऐसे साधक जनक की तरह विरले ही होते हैं ।
योग वासिष्ठ में चूडाला उपाख्यान में लिखा है कि- हे राजन् ! स्त्री धन घर राज्य भूमि छत्र भाई बन्धु यह सब आपके नहीं है जो इनको त्याग कर आप अपने को सर्वत्यागी कहते हो । आपका तो इनमें केवल अहंकार मात्र है कि ये मेरे हैं । अतः जब तक आप अशेष अहंकार को नहीं त्याग दोगे तब तक सर्वत्यागी नहीं हो सकते हैं । अहं भाव के त्यागने मात्र से वे स्वयं ही त्यागे जायेंगे । इसिलिये लिखा है कि विकार को पैदा करने वाली सारी सामग्रियों के रहने पर जिसके मन में विकार पैदा नहीं होते वे ही धीर कहलाते हैं । केवल बाह्य उपकरणों के त्याग से शुद्ध ज्ञान नहीं होता है । केवल बाह्य पदार्थों का त्याग आडम्बर मात्र है । त्याग तो आसक्ति का ही उचित है । उसी से ज्ञान होता है ।
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*जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ ।*
*चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥६४॥*
केवल शूर वेश धारण करने मात्र से शूरवीर नहीं होता । किन्तु जब कामादि शत्रुओं के सन्मुख होकर उनके साथ युद्ध करेगा और उनके वेग के सामने व्यथित न होकर जो परांगमुख नहीं होता । किन्तु विवेक विचार के द्वारा उनके साथ युद्ध करके उनका समूल उन्मूलन कर देता है तब की वह शूर कहलाता है ।
वासिष्ठ में लिखा है कि- जैसे रात्रि में तुषार के गिरने से सारा लोक घने अन्धकार से ढक जाता है उसी तरह अज्ञान रूपी रात्रि में अविचार रूपी तुषार के कारण शास्त्र ज्ञान के प्रकाश का नाश हो जाने से दूसरों को दुःख देने में चतुर सैकड़ों विषय रूपी चोर सब दिशाओं में सर्वदा विवेक रूपी रत्न को चुराने में लगे हुए हैं । उनके साथ युद्ध करने में तत्त्वज्ञ पुरुष को छोड़ कर अन्य कोई भी समर्थ नहीं हो सकते ।
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*शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार ।*
*साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥६५॥*
जो साधक इस आध्यात्मिक युद्ध में सर्वदा सत्य विवेक सद्विचार शास्त्रज्ञान बल से सुसज्जित रहता है और भगवत् शरणागति के बल पर काम क्रोधादि से लड़ कर विजय पाता है तब ही शूरवीर कहलाता है ।
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*दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल ।*
*तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥६६॥*
यह साधनसंग्राम है । केवल बाजीगर के खेल के समान दिखावा नहीं है । अतः जब तक कृतात्मसाक्षात्कार सन्तों के वचन रूपी वाणों से अन्तःकरण विध नहीं जाता तथा प्रभु की प्रेमाभक्ति से आप्लावित नहीं होता तब तक प्रभु कैसे प्राप्त हो सकते हैं ?
(क्रमशः)

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