सोमवार, 28 दिसंबर 2020

(“षष्टमोल्लास” ८२/८४)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ८२/८४)
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*एक रानी विपरीत बोली*
*फाटी कंथा खड़ खड़ काया,*
*केस वांधि अरु सिद्घ कहाया ।* 
*फिरो कुढंगा बन के मांही,*
*माया के सुख समझो नांहीं ॥८२॥ *
आपकी कंथा(वस्त्र) फटी हुई है, शरीर अति दुर्बल है, शिर पर केश बांधकर सिद्घ कहलाते फिरते हो, उक्त प्रकार के कुढंग से बन में फिरते हो माया सुखों को समझते नहीं हो ॥८२॥ 
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*घरि घरि बारि जु होहि खवारू,*
*फिरो विगारत राजकुवारू ।* 
*ताता सीला पीवौ नीरू,*
*कष्ट करौ और दुखी शरीरू ॥८३॥* 
इसी कारण घर घर के द्वारों पर जाकर भी भिक्षा नहीं मिले तो खराब ही होते हो, फिर भी आप राजकुमारों को बिगाड़ते फिरते हो, ग्रीष्मकाल में गर्म जल एवं शीतकाल में अत्यन्त ठंडा जल आपको पीना पड़ता है स्वयं मन से कष्टी रहते हो और शरीर को भी कष्ट देते हो ॥८३॥ 
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*आपहु बिगरे और भ्रमाई,*
*होहु जगत मैं बड़े अन्याई ।* 
*अपनो घर खोई और न खोवै,*
*गांवगांव उच कुल ही विगोवौ ॥८४॥* 
आप तो बिगड़ें हुये हो ही, अन्यों को भी बहकाते फिरते हो आप तो जगत में अति अन्याई ज्ञात होते हो । अपना घर तो आपने छोड़ ही दिया अन्यों के घर भी छुडा रहे हो । गांव गांव मैं जाकर उच्च कुल के लोगों को और बिगाड़ रहे हो ॥८४॥
(क्रमशः)

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