सोमवार, 28 दिसंबर 2020

*जीवन का अन्तिम लक्ष्य- ईश्वर से प्रेम*

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*अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार ।*
*गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २४९)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(३)
*जीवन का अन्तिम लक्ष्य- ईश्वर से प्रेम* 
श्रीरामकृष्ण के कमरे में धूप दिया गया है । उसी छोटे तख्त पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण ईश्वरचिन्तन कर रहे हैं । मणि जमीन पर बैठे हुए हैं । राखाल, लाटू, रामलाल ये भी कमरे के अन्दर हैं ।
श्रीरामकृष्ण मणि से कह रहे हैं, - “बात है उन पर भक्ति करना – उन्हें प्यार करना ।” फिर उन्होंने रामलाल से गाने के लिए कहा । रामलाल मधुर कण्ठ से गाने लगे । श्रीरामकृष्ण हर गाने का पहला चरण कह दे रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण के कहने पर रामलाल पहले श्रीगौरांग का संन्यास गा रहे हैं ।
(भावार्थ) – “केशवभारती के कुटीर में मैंने कैसी अपूर्वज्योति गौरांगमूर्ति देखी ! उनके दोनों नेत्रों में शत धाराओं से होकर प्रेम बह रहा है । मत्त मातंग के सदृश श्रीगौरांग कभी तो प्रेमावेश में नाचते हुए गाते हैं, कभी धूल में लोटते हैं, कभी आँसुओं में बहते हैं । वे रोते हुए हरि को पुकार रहे हैं । उनका उच्च स्वर स्वर्ग और मर्त्यलोक को भी हिला रहा है । कभी वे दाँतों में तृण दबाकर, हाथ जोड़, बार बार दासता से मुक्त कर देने के लिए परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं । अपने घुँघराले बालों को मुँड़ाकर उन्होंने योगी का वेश धारण किया है । उनकी भक्ति और प्रेमोवेश को देखकर जी रो उठता है । जीवों के दुःख से दुःखी होकर, सर्वस्व त्यागकर वे प्रेम प्रदान करने के लिए आए हैं । ‘प्रेमदास’ की यही अभिलाषा है की वह श्रीचैतन्यदेव के चरणों का दास होकर उनके साथ दर दर घूमे ।”
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रामलाल ने फिर एक गाना गया । इसमें श्रीगौरांग की माता शची का विलाप है ।
इसके बाद श्रीरामकृष्ण के आदेशानुसार रामलाल ने कुछ और गाने गाए ।
श्रीरामकृष्ण रामलाल से फिर ‘गौरांग और नित्यानंद’ वाला गाना गाने के लिए कह रहे हैं । इस बार रामलाल के साथ श्रीरामकृष्ण भी गा रहे हैं ।
(भावार्थ) – “हे प्रभु श्रीगौरांग और नित्यानन्द, तुम दोनों भाई बड़े ही दयालु हो ! यही सुनकर मैं यहाँ आया हूँ । मैं काशी गया था । वहाँ विश्वेश्वरजी ने मुझसे कहा है, वे परब्रह्म इस समय शचीदेवी के घर में हैं । हे परब्रह्म ! मैंने तुम्हें पहचान लिया है । मैं कितनी ही जगह गया, परन्तु इस तरह के दयासागर और कहीं मेरी दृष्टि में नहीं पड़े । तुम दोनों व्रजमण्डल में कृष्ण बलराम थे । अब नदिया में आकर श्रीगौरांग और नित्यानन्द हुए हो ! तुम्हारी व्रज की क्रीड़ा थी दौड़धूप और अब यह नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है धूल में लोटपोट हो जाना । व्रज में तुम्हरी क्रीड़ा जोर जोर की किलकारियाँ थीं और आज नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है, हरिनाम-कीर्तन । तुम्हारे सब और अंग तो छिप गए हैं, परन्तु दोनों बंकिम नेत्र अब भी हैं । तुम्हारा पतितपावन नाम सुनकर मेरे हृदय में बहुत बड़ा भरोसा हो गया है । मैं बड़ी आशा से यहाँ दौड़ा हुआ आया हूँ । तुम अपने चरणों की शीतल छाया में मुझे स्थान दो । जगाई और मधाई जैसे पाखण्डी भी तर गए हैं; प्रभो, यही भरोसा मुझे भी है । मैंने सुना है, तुम दोनों चाण्डालों को भी हृदय से लगा लेते हो, हृदय से लगाकर हरिनाम-कीर्तन करते हो ।”
(क्रमशः)

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