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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ३७/४०*
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कहि जगजीवन रांमजी, अनभै अनहद नांद ।
तेज पुंज अबिगति अलख, रस मांही रस स्वाद ॥३७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आपका सानिध्य अभय कर दिव्य अनहद नाद सुनवाता है ओर श्रेष्ठ दर्शन करवाता है । और श्रेष्ठ आस्वादन करवाता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, मन मांही मन लीन ।
अपणां अंग मंहि कीजिये१, ज्यौं जल मांही मीन ॥३८॥
(१. अपणाँ अंग महिं कीजिये=स्वसदृश बना लीजिये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु मैं आपके ध्यान में ही लीन रहूँ मुझ पर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं इस प्रकार आप में रहूं जैसे जल में मछली रहती है । आपसे अलग मेरा कोइ जीवन न हो ।
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कहि जगजीवन रांमजी, ज्यों सुत मात सनेह ।
यों हरि तुमसौं आतमां, बिलसै देह विदेह ॥३९॥
संतजगजीवन जी कहते है कि हे प्रभु मैं आपके साथ ऐसे रहूं जैसे पुत्र माता के साथ रहता है यह आत्मा आपसे कभी अलग न हो ।
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कहि जगजीवन रांमजी, पड़ै न कबहूं देह ।
आदि२ अंत मधि एक रस२, जे तुम सौं बंधै स्नेह ॥४०॥
(२-२, आदि अंत मधि एकरस=सभी ऊँची नीची परिस्थितियों में समान रूप से)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु आपके सानिध्य में यह देह कभी भी बाधा बन कर नहीं आये आरंभ मध्य व अन्त तक आपका स्नेह बना रहे ।
(क्रमशः)

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