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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग धनाश्री २७(गायन समय दिन ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४२८ - *कर्ता कीर्ति* । त्रिताल
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काइमाँ१ ! कीर्ति करूँली रे,
तूँ मोटो दातार ।
सब तैं सिरजीला साहिबजी,
तूँ मोटो कर्तार ॥टेक॥
चौदह भुवन भानै घड़ै,
घड़त न लागे बार ।
थापै उथपै तूँ धणी,
धन्य धन्य सिरजनहार ॥१॥
धरती अम्बर तैं धर्या,
पाणी पवन अपार ।
चँद सूर दीपक रच्या,
रैन दिवस विस्तार ॥२॥
ब्रह्मा शँकर तैं किया,
विष्णु दिया अवतार ।
सुर नर साधू सिरजिया,
कर ले जीव विचार ॥३॥
आप निरंजन ह्वै रह्या,
काइमां कौतिकहार ।
दादू निर्गुण गुण कहै,
जाऊंली हौं बलिहार ॥४॥
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ईश्वर का यश गान कर रहे हैं - हे अचल१ परमेश्वर ! मैं आपका यश गान करूँगा, आप सबसे महान् दाता हैं । हे प्रभो ! सब सँसार आपने ही रचा है, आप ही महान् और सँसार के कर्ता हैं ।
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आप चौदह भुवनों को बना कर नष्ट कर देते हैं और पुन: बनाने में आपको कुछ भी देर नहीं लगती । आप ही सबको स्थापित करने वाले और उखाड़ने वाले स्वामी हैं । सृष्टि - कर्ता ! आपको धन्य है, धन्य है ।
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आपने ही पृथ्वी और आकाश को बना कर रक्खा है । हे अपार ! आपने
ही जल, वायु, चन्द्र, सूर्य, दीपक और रात्रि - दिनादि सँसार का विस्तार रचा है । ब्रह्मा तथा शँकर आपने ही बनाये हैं ।
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सँसार की रक्षा के लिये आपने ही विष्णु तथा अन्य अवतार प्रकट कर दिये हैं । देवता, नर और सँत आपने ही उत्पन्न किये हैं । अरे जीव ! उन प्रभु के गुण और स्वरूप सम्बन्धी विचार करके उन्हें प्राप्त कर ।
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वे प्रभु सत्ता मात्र से सँसार रूप खेल करने वाले हैं, स्वयँ तो माया रहित होकर अचल हो रहे हैं । मैं उन्हीं निर्गुण प्रभु के गुण कह रहा हूं और उन्हीं की बलिहारी जाऊंगा ।
(क्रमशः)

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