गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

= *स्वांग का अंग १३२(१०१/१०४)* =

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू माया माहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह ।*
*दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*स्वांग का अंग १३२*
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षट्दर्शन१ मन रंजना, दुख भंजन गोविन्द ।
जन रज्जब राम हिं भजो, स्वांग२ सभी जग फंद ॥१०१॥
छ: प्रकार के भेष१ तथा भेषधारी तो मन को ही प्रसन्न करते हैं, दुख को दूर करने वाले तो गोविन्द ही हैं । भेष२ तो सभी जगत के फंदे में फंसने वाले हैं, उनका अग्रह छोड़कर राम का भजन करो तब ही मुक्त हो सकोगे ।
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माया बेड़ी तोड़ कर, कोई कोई निकसे प्राण ।
रज्जब जड़िये१ स्वांग सौं, आगे लहै न जाण ॥१०२॥
माया रूप बेड़ी को तोड़ कर कोई कोई प्राणी ही भेष के आग्रहरूप कैद से निकलते हैं, बाकि तो सब भेष के आग्रहरूप कैद में बंद१ हैं, प्रभु की ओर आगे जा ही नहीं सकते ।
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बाधे सांकल स्वांग सौं, बिनहीं ज्ञान विचार ।
ज्यों रज्जब पशु बंदि१ में, बहुते राज दुवार ॥१०३॥
जैसे राजा के द्वार पर बहुत से पशु साँकल से बंधे रहते हैं, वैसे ही भेषधारी बिना ज्ञान-विचार के ही प्राणीयों को भेष में बांधकर अपनी कैद१ में पटक लेते हैं ।
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भोला पहरै भेष को, पीछै पण पड़ि जाय ।
जन रज्जब जग यूं बंधे, कौन छुड़ावै आय ॥१०४॥
पहले भोला मानव ही भेष को पहनाता है, पिछे हठ पड़ जाता है, इस प्रकार जगत् के प्राणी बंधे हैं, कौन आकर इन्हें इस आग्रह से छुड़ावे, ये अपना हठ छोड़ते ही नहीं ।
(क्रमशः)

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