🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नांहि ।*
*रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु ---------स्वाध्याय
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गोविन्दगढ(जयपुर) में दादूपंथी संत चैन जी दादूवाणी का पाठ करते थे तब उनके नेत्रों से अश्रु पड़ने लगते थे । वाणी गदगद् हो जाती थी । उस समय की उनकी जिज्ञासु अवस्था अकथनीय ही थी । उस प्रेम के प्रभाव से ही वे अच्छे संत माने जाते हैं । ईश्वर और संत वाणी पढने से प्रेम पात्र का स्मरण हो जाता है, तब भक्त के तन-मन में सात्तिवक भावों का आर्भिभाव होना स्वभाविक ही जाता है । पाठ करते हुए यदि हर्षादिक नहीं हुये तो पाठ ही क्या ? वह तो एक दैनिक कार्य ही हुआ ।
हरि अरु हरि भक्तन गिरा, पढत सन्त हर्षाय ।
चैन पढत दादू गिरा, नैन अश्रु टपकाय ॥६९॥

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