गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

= ४३४ =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग धनाश्री २७(गायन समय दिन ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४३४ - *विनती* । त्रिताल
गोविन्द के चरणों ही ल्यौ लाऊं ।
जैसे चातक वन में बोल ह्वै, पीव पीव कर ध्याऊं ॥टेक॥
सुरजन मेरी सुनहु वीनती, मैं बलि तेरे जाऊं ।
विपति हमारी तोहि सुनाऊं, दे दर्शन क्यों हिं पाऊं ॥१॥
जात दुख सुख उपजत तन को, तुम शरणागति आऊं ।
दादू को दया कर दीजै, नाँउँ तुम्हारो गाऊं ॥२॥
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४३४ - ४३५ में दर्शनार्थ विनय कर रहे हैं - गोविन्द के ही चरणों में वृत्ति लगाता हूं । जैसे चातक पक्षी वन में स्वाति बिन्दु के लिये पीव २ बोलता है, वैसे ही प्रियतम २ करते हुये उन प्रभु का ध्यान करता हूं ।
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हे सुर - गणों के स्वामिन् ! मेरी विनय सुनिये, मैं आपकी बलिहारी जाता हूं और अपनी विपत्ति आपको सुनाता हूं । आप मुझे दर्शन दीजिये । मैं आपको कैसे प्राप्त कर सकूंगा, वह उपाय भी बताइये ?
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जो आपकी शरण आते हैं, उनके दु:ख चले जाते हैं और शरीर में सुख उत्पन्न होता है । मैं भी आपकी शरण आया हूं, आपका नाम गान करता हूं, मुझे भी दया करके दर्शन द्वारा सुख प्रदान करिये ।
(क्रमशः)

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