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*दादू कहिए कुछ उपकार को, मानै अवगुण दोष ।*
*अंधे कूप बताइया, सत्य न मानै लोक ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*चन्द्रहास की पद्य टीका*
*भूपति के सुत चंदरहास जु,*
*खोस लियो पुर और सु ल्याई ।*
*धृष्टबुधी घर आप रहै सुत,*
*बालन में नित केलि कराई ॥*
*विप्रन को समुदाय भयो जित,*
*जाय कुमारन धूम मचाई ।*
*बोल उठे द्विज ह्वै कवरी वर,*
*बालन यौं सुन लाज न माई ॥५६॥*
द्वापर युग में केरल देश में मेधावी नामक राजा राज्य करता था, शत्रुओं ने उस पर चढाई करदी । युद्ध में मेधावी मारे गये, रानी सती हो गई, राजधानी का नगर तथा राज्य शत्रुओं ने छीन लिया । राजा के एक चन्द्रहास ही पुत्र था और वह अभी शिशु ही था । उसकी धाय छिपाकर उसे नगर से निकाल कर कुन्तलपुर ले गई । कुन्तलपुर के राजा गालव ऋषि के शिष्य और भगवद् भक्त थे, उनके पुत्र न था चम्पक मालिनी नाम की एक पुत्री थी ।
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उनका प्रधानमंत्री धृष्टबुद्धि था, वही सब राज्य का कार्य करता था । राजा भगवद् भजन में ही लगे रहते थे । धृष्टबुद्धि के मदन और अमल दो पुत्र थे । विषया नाम की एक पुत्री थी । चन्द्रहास की धाय चन्द्रहास के साथ धृष्टबुद्धि ही के रहने लगी । दासी के समान मजदूरी करके कार्य करते हुये तीन वर्ष की अवस्था तक चन्द्रहास का पालन करती रही, अन्त में वह काल का ग्रास हो गई । एक दिन प्रभु-प्रेरणा से नारदजी घूमते हुये कुन्तलपुर आ पहुँचे और बालक चन्द्रहास को अधिकारी समझ कर एक शालग्राम की मूर्ति देकर पूजन पद्धति बता दी तथा राम-नाम का मंत्र भी दिया ।
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अब चन्द्रहास भक्त बन गया । हरिनाम संकीर्तन करते हुये तथा बालकों से कराते हुये नित बालकों में खेला करते थे । एक दिन धृष्टबुद्धि के घर किसी निमित्त से कुछ विद्वान ब्राह्मणों का समूह जुटा था । चन्द्रहास बालकों के साथ संकीर्तन करते हुये वहां आ पहुँचे ।
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बालकों द्वारा नाम संकीर्तन की धूम-धाम मची देख कर विप्र बालकों पर प्रसन्न हुये और चन्द्रहास को पास बैठाकर उसके शरीर के चिन्ह आदि देख कर एक विद्वान ब्राह्मण ने धृष्टबुद्धि को कहा- आप इस बालक को प्रेम से रक्खा करो, यही तुम्हारी पुत्री का पति होगा तथा इस देश का राजा भी होगा । बालकों के समूह में यह बात सुनकर धृष्टबुद्धि के हृदय में लज्जा नहीं समाई अर्थात् वह अत्यन्त लज्जित हुआ ।
(क्रमशः)

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