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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ५५/५७)
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*संसा सकल जु दिया गंवाई,*
*निख सिख मंगल उपज्यो राई ।*
*स्वामी कृपा तै मिटया कलेसू,*
*श्रवण द्वारि सुन्यो उपदेसू ॥५५॥*
राजा के सारे ब्रह्म माया विषयक संशय समाप्त हो गये एवं उसके नख से शिखा तक सम्पूर्ण शरीर में मंगलमय शक्ति का ही संचार हो गया । श्रवण के द्वारा स्वामी जी के ब्रह्मचर्चा युक्त उपदेश सुनने से, स्वामी जी की कृपा से उसके सम्पूर्ण सांसारिक क्लेश संकट समाप्त हो गये ॥५५॥
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*निर्पख मारग आयो हाथू,*
*रहे मगन ब्रह्म के साथू ।*
*अगम अगोचर पायो बोधू,*
*उर मंहि पैठि हर को सोधू ॥५६॥*
स्वामी जी के उपदेश से राजा को निष्पक्ष साधना का मार्ग प्राप्त हो गया अत: वह ब्रह्म चिन्तन करते हुये ब्रह्म के साथ ही रहने लगा । उसे अगम अगोचर ब्रह्म का ज्ञान हो गया और अपने हृदय में सदा उस निरंजन को ही शोधने लगा ॥५६॥
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*प्रापति भई सु सुख की सीरू,*
*निर्मल ज्योति मिल्या हरि हीरू ।*
*परम प्रसिद्घ गह्या पथ आदू,*
*दियौ कृपा करि स्वामी दादू ॥५७॥*
राजा को आत्मानंद स्वरूप सुख की सी स्रोत प्राप्त हो गया था एवं ब्रह्म रूप निरंजन ज्योति स्वरूप हीरा उसको प्राप्त हो गया । स्वामी दादूजी ने अति कृपा कर उसे प्राचीन प्रसिद्घ संतमार्ग का प्रांरभिक मार्ग बता दिया था जो उपनिषद वेदा सम्मत था ॥५७॥
(क्रमशः)

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