🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ५/८*
.
कहि जगजीवन जे रुचे, जे हरि सबद सुहाइ ।
अबिगत भावै भगति सौं, रांम क्रिपा रस पाइ ॥५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसे स्मरण प्रिय है, उसे ही प्रभु नाम भाता है । वह राम कृपा से अविगत भक्ति को पाते हैं ।
.
वपु को नाखै३ नांम मंहि, स्यंध व स्यंध समांन ।
कहि जगजीवन भगति हरि, अलख एक रस ध्यांन ॥६॥
(३. वपु को नाखै=शरीर को डाल दे)
संतजगजीवन कहते है । कि जो जन शरीर को प्रभु नाम में समुद्र जैसे एकाकार कर लेते हैं जैसे विभिन्न नदियां समुद्र में आकर एक वर्ण होजाती हैं उसी प्रकार हरि जन भी हरि भक्ति में एकरस होते हैं चाहे वह स्मरण हो या ध्यान ।
.
कहि जगजीवन नांम ले, रांम रांम ल्यौ लाइ ।
कोटि ग्रंथ का महात्म४, दोइ अक्षर मंहि पाइ ॥७॥
{४. महात्म=महिमा (=उत्तमता)}
संतजगजीवन जी नाम स्मरण की महिमा बतलाते हुए कह रहे हैं कि करोड़ों ग्रन्थों का महत्व दो ही अक्षर है राम नाम है ।
.
दोइ अक्षर मांहि सकल, कोटि ग्रंथ किहिं कांम ।
कहि जगजीवन सब पढ्या, जे चित आवै रांम ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि करोड़ों ग्रन्थ किसी काम के नहीं है । यदि मानस में दो अक्षर राम नाम के हैं तो वह ही पर्याप्त हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें