शनिवार, 19 दिसंबर 2020

= ४२५ =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग धनाश्री २७(गायन समय दिन ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४२५ - *करुणा विनती* । त्रिताल
जनि१ छाडै राम, जनि छाडै, 
हमहिं विसार, जनि छाडै ।
जीव जात न लागै बार, जनि छाड़ै ॥टेक॥
माता क्यों बालक तजै, सुत अपराधी होइ ।
कबहुं न छाडै जीव तैं, जनि दुख पावै सोइ ॥१॥
ठाकुर दीनदयाल है, सेवक सदा अचेत ।
गुण औगुण हरि ना गिणैं, अंतर तासौं हेत ॥२॥
अपराधी सुत सेवका, तुम हो दीन दयाल ।
हम तैं औगुण होत हैं, तुम पूरण प्रतिपाल ॥३॥
जब मोहन प्राणी चलै, तब देही किहिं काम ।
तुम जानत दादू का कहै, अब जनि छाड़ै राम ॥४॥
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४२५ - ४२६ में विरह दु:ख पूर्वक विनय कर रहे हैं - हे राम जी ! हम बारम्बार विनय कर रहे हैं, आप हमको भूलकर भी न१ त्यागिये । जीव को शरीर से जाते देर नहीं लगती, न जाने वह कब चला जाय, इसलिये हमें कभी भी न त्यागिये ।
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पुत्र दोषी भी हो तो भी माता, बालक पुत्र को कैसे तजेगी ? वह सुत को अपने मन से कभी भी नहीं त्यागती और सुत दु:ख न पावे ऐसा ही व्यवहार करती है ।
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वैसे ही आप स्वामी तो दीनदयालु हैं, सेवक की रक्षा के लिये सदा सचेत रहते
हैं । हे हरे ! आप शरीर के सुरूप कुरूपादि गुण अवगुण तो नहीं देखते, जो क्त के भीतर हृदय का भाव है, उसी से प्रेम करते हो ।
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हम तो आपके अपराधी सुत सेवक हैं, आप दीन दयालु हो । हमारे से तो अवगुण ही होते हैं किन्तु आप तो फिर भी पूर्ण रूप से रक्षा करते हैं ।
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हे मोहन ! जब जीव चला जाय तब शरीर किस काम का है ? यह सब आप जानते ही हैं, मैं आपको क्या कहूँ ? मेरी तो यही विनय है कि आप मुझे न छोड़ें ।
(क्रमशः)

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