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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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२३. परिचय विनती ~
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अहो ! गुण तोर, अवगुण मोर, गुसाँई ।
तुम कृत कीन्हा, सो मैं जानत नांहीं ॥टेक॥
तुम उपकार किये हरि केते,
सो हम बिसर गये ।
आप उपाइ अग्निमुख राखे,
तहाँ प्रतिपाल भये, हो गुसाँई ॥१॥
नख - सिख साज किये हो सजीवन,
उदर आधार दिये ।
अन्न - पान जहँ जाइ भस्म हो,
तहाँ तैं राखि लिये, हो गुसाँई ॥२॥
दिन दिन जान जतन कर पोषे,
सदा समीप रहे ।
अगम अपार किये गुन केते,
कबहूँ नांहि कहे, हो गुसाँई ॥३॥
कबहूँ नांहि न तुम तन चितवत,
माया मोह परे ।
दादू तुम तज जाइ गुसाँई,
विषया मांहि जरे, हो गुसाँई ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज, परमेश्वर का साक्षात्कार होने के बाद विनय कर रहे हैं कि प्रभु ! आपके हमारे ऊपर अनन्त उपकार हैं, ...
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किन्तु हे प्रभु ! आपके किये उपकारों को मैं याद नहीं रखता । सो यह मेरा महान् दोष है । हे हरि ! आपने हमारे शरीर को उत्पन्न किया और गर्भवास में जठराग्नि के मुख से इसकी ऱक्षा करी और...
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नख से शिखा पर्यन्त सारे शरीर को अंग उपांगों से अर्थात् इन्द्रियों से सजा कर चैतन्य - सत्ता द्वारा चेतन बनाया । फिर उलटे मुख जहाँ झूलता था, वहाँ आपने आश्रय दिया तथा जहाँ अन्न - जल जठराग्नि से पचता है, वहाँ आपने कोमल शरीर की रक्षा की है और....
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प्रतिदिन नाल के द्वारा आपने हमारा पोषण किया, अर्थात् पोख दिया और नजदीक रहकर हमारी रक्षा की । इस प्रकार हे प्रभु ! आपने हमारे ऊपर कितने ही उपकार किये हैं जो अगणित, अगम और अपार हैं, परन्तु फिर भी आपने कभी ऐसा नहीं कहा कि मैंने तुम्हारे ऊपर इतना उपकार किया है ।
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यह हमारा अति महान् दोष है, जो कि हमने आपके स्वरूप की ओर कभी देखा भी नहीं, क्योंकि हम आपको छोड़कर माया, मोह और विषयों की तरफ ही लगे रहे और उन्हीं में पुन - पुनः जलते रहे ।
मात पिता की गम नहीं, तहाँ पिवायो खीर ।
सो गुण थारा रामजी, बखनौं लख्या सरीर ॥२३॥
समय पै स्मरण ना करै, अंतकाल नर रोय ।
‘जगन्नाथ’ दसकंध ज्यूं, पछताये क्या होय ॥२३॥
(क्रमशः)

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