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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ५१/५४)
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*दादू तन तैं कहाँ डराइये, जे विनश जाइ पल बार ।*
*कायर हुआ न छूटिये, रे मन हो हुसियार ॥५१॥*
*दादू मरणा खूब है, मर माहीं मिल जाइ ।*
*साहिब का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥५२॥*
भागवत में- मृत्यु चाहे आज हो जावे या सौ वर्ष के बाद में हो । क्योंकि वह टलेगी नहीं । ऐसा कहा है- हे साधक यदि मृत्यु के भय से युद्ध भूमि को त्याग कर भागना तब ही उचित होगा कि अन्यत्र मृत्यु न हो । मृत्यु तो जीव के साथ सर्वत्र ही चलती है । अतः युद्ध क्षेत्र से भाग कर अपने यश को भी मलिन क्यों कर रहे हो ।
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*॥ सूरातन ॥*
*दादू माहीं मन सौं झूझ कर, ऐसा शूरा वीर ।*
*इंद्रिय अरि दल भान सब, यों कलि हुआ कबीर ॥५३॥*
यह आध्यात्मिक लड़ाई है । जो साधक अपने मन से लड़ कर कामादि शत्रुओं पर विजय पाकर इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को जीत कर जितेन्द्रिय होता हुआ संसार से निर्मम हो जाता है वह शूरवीर कहलाता है । जैसे महात्मा श्री कबीर जी जितेन्द्रिय हकार वीर कहलाये । गीता में कहा है कि- जब साधक मन के विकारों को समाप्त कर देता है और अपने मन को आत्मा में स्थित कर के प्रसन्न रहता है तो वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है ।
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*सांई कारण शीश दे, तन मन सकल शरीर ।*
*दादू प्राणी पंच दे, यों हरि मिल्या कबीर ॥५४॥*
जो साधक अहंकार रुपी शिर को काट डालता है तथा पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा मन और शरीर को जीत कर शान्त मन से स्थित है वह ही ब्रह्म को पाता है । जैसे कबीर जी ने जितेन्द्रिय होकर ब्रह्म को प्राप्त किया था । यह अहंकार ही सब दोषों की उत्पत्ति का स्थान है ।
योगवासिष्ठ में कहा है- इस शरीर रूपी जंगल में अहंकार रूपी सिंह गरज रहा है, इसी से यह सारा संसार फैला हुआ है । जब साधक इस अहंकार को मूल सहित नष्ट कर देता है तो यह संसार रूपी सारी व्याधियाँ स्वयं ही नष्ट हो जाती है ।
(क्रमशः)

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