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*दादू जल दल राम का, हम लेवैं परसाद ।*
*संसार का समझैं नहीं, अविगत भाव अगाध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*तीव्र वैराग्य तथा संसारत्याग*
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण थोड़ा आराम कर रहे हैं । मास्टर पास बैठे हुए हैं । इसी समय श्याम डाक्टर तथा और भी कुछ आदमी आए । श्रीरामकृष्ण उठकर बैठ गए और बातचीत करने लगे ।
श्रीरामकृष्ण – बात यह नहीं कि कर्म बराबर करते ही जाना पड़े । ईश्वरलाभ हो जाने पर कर्म फिर नहीं रह जाते । फल होने पर फूल आप ही झड़ जाते हैं ।
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“जिसे ईश्वरप्राप्ति हो जाती है उसके लिए सन्ध्यादि कर्म नहीं रह जाते । सन्ध्या गायत्री में लीन हो जाती है; तब गायत्री जपने से ही काम हो जाता है । और गायत्री का लय ओंकार में हो जाता है; तब गायत्री जपने की भी आवश्यकता नहीं रह जाती । तब केवल ‘ॐ’ कहने से ही हो जाता है । सन्ध्यादि कर्म कब तक है ! – जब तक हरिनाम या रामनाम में पुलक न हो, अश्रुधारा न बहे । धन के लिए या मुकदमा जीतने के लिए आदि कर्म कर्ण आच्छा नहीं ।”
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एक भक्त – धन की चेष्टा तो, मैं देखता हूँ, सभी करते हैं । केशव सेन को ही देखिये, किस तरह महाराजा के साथ उन्होंने अपनी लड़की का विवाह किया ।
केशव की बात दूसरी है । जो यथार्थ भक्त है वह अगर चेष्टा न भी करे तो भी ईश्वर उसके लिए सब कुछ जुटा देते हैं । जो ठीक ठीक राजा का लड़का है वह मुशाहरा पाता है । वकील आदि की बात मैं नहीं कहता – जो मेहनत करके, दूसरों की दासता करके रुपया कमाते हैं । मैं कहता हूँ, ठीक राजा का लड़का । जिसे कोई कामना नहीं है वह रुपया-पैसा नहीं चाहता; रुपया उसके पास ही आता है । गीता में है- यदृच्छालाभ ।
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“जो सद्ब्राह्मन है, जिसे कोई कमाना नहीं है, वह चमार के यहाँ का भी सीधा ले सकता है । ‘यदृच्छालाभ’ । वह कामना नहीं करता, उसके पास प्राप्ति आप ही आती है ।”
एक भक्त – अच्छा महाराज, संसार में किस तरह रहना चाहिए ?
श्रीरामकृष्ण – पाँकाल मछली की तरह रहना चाहिए । संसार से दूर निर्जन में जाकर कभी कभी इश्वरचिन्तन करने पर उनमें भक्ति होती है । तब निर्लिप्त होकर संसार में रह सकोगे । पाँकाल मछली कीच के भीतर रहती है, फिर भी कीच उसकी देह में नहीं लगता । इस तरह का आदमी का अनासक्त होकर संसार में रहता है ।
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श्रीरामकृष्ण देख रहे हैं, मणि एकाग्र चित्त से उनकी सब बातें सुन रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(मैं को देखकर) – तीव्र वैराग्य होने से लोग ईश्वर को पाते हैं । जिसे तीव्र वैराग्य होता है, उसे जान पड़ता है, संसार दावाग्नि की तरह है – जल रहा है ! वह स्त्री और पुत्र को कुएँ के सदृश देखता है । इस तरह का वैराग्य जब होता है तब घर-द्वार आप ही छूट जाता है । केवल अनासक्त होकर संसार में रहना उसके लिए पर्याप्त नहीं है । कामिनी-कांचन यही माया है । माया को अगर पहचान सको तो वह आप लज्जा से भाग खड़ी होगी । एक आदमी बाघ ओढ़कर भय दिखा रहा है । जिसे भय दिखा रहा है उसने कहा, मैं तुझे पहचानता हूँ, तू तो ‘हिरुआ’ है । तब वह हँसकर चला गया – और किसी दूसरे का भय दिखाने लगा ।
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“जितनी स्त्रियाँ हैं सब शक्तिरूपिणी हैं । वही आदिशक्ति स्त्री का रूप धारण किए हुए है । अध्यात्मरामायण में है – नारदादि राम का स्तव करते हैं, ‘हे राम, जितने पुरुष हैं सब आप हैं और प्रकृति के जितने रूप हैं सब सीता हैं । तुम इन्द्र हो, सीता इन्द्राणी; तुम शिव हो, सीता शिवानी; तुम नर हो, सीता नारी; अधिक और क्या कहूँ – जहाँ पुरुष है वहाँ तुम हो, जहाँ स्त्रियाँ हैं वहाँ सीता ।’
(क्रमशः)

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