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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ६१/६३)
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*राजा बन में निवास*
*स्याहतपुर आरणि अस्थानू,*
*स्वामी नृप गये जिंहि ठामूं ।*
*कछु जांम तहां कियो वासूं,*
*पीछे खबरि भई रणवासू ॥६१॥*
स्याहतपुर में एक वन प्रदेश है उसी में राजा एवं स्वामी दादूजी देवी मंदिर को छोड़कर एकान्त स्थान में चल गये जहां ब्रह्म चर्चा की । कुछ प्रहर समय उनके वहां निवास करने के पश्चात् राजा के राणीवास में खबर पहुंची कि राजा दादूजी के साथ वन में प्रस्थान कर गये हैं । राणियों को सन्देह हुआ कि राजा कही दादूजी के साथ वन में रह जावे और महलों में न आवे ॥६१॥
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*माया ठगनी*
*सवा चारि सै ताकै यूवती,*
*गयो कहां नणद को गोती ।*
*करी ततवीर रु सकल सिंगारू,*
*साजि कांमिनी भई तैयारू ॥६२॥*
राजा पदमसिंघ के सवाचार सौ राणियां थी वे सोच रही थी कि हमारे पति कहां चले गये । जब उनको पता लग गया तब वे सब श्रृंगार करके राजा के पास जाने को तैयार हो गई ॥६२॥
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*चलो वेगि नहीं होहि उदासू,*
*जाइ कहां हम सौ है पासू ।*
*कौन राव सो जाइ विचारू,*
*तीन्यूं लोक हमारो पसारू ॥६३॥*
सबने परस्पर विचार किया कि हमें शीघ्र राजा के पास चलना चाहये उदास नहीं होना चाहिये । हमारे वहां पहुंच जाने पर हमारे पास से वे अन्यत्र नहीं जा सकेंगे । तीनों लोक में हमारा ही तो जाल फैला हुआ है । ऐसा ज्ञान विचार है ही कौनसा कि जिसके बल से राजा हमारा त्याग करके जायेंगे ॥६३॥
(क्रमशः)

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