रविवार, 20 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ३४/३७

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ३४/३७)
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*पंच चोर चितवत रहैं, माया मोह विष झाल ।*
*चेतन पहरै आपने, कर गह खड़ग संभाल ॥३४॥*
ये पाचों ज्ञानेन्द्रियाँ चोर की तरह साधक की ब्रह्माकार वृत्ति को देख कर चुरा लेती हैं और उनको चुरा कर मायिक प्रपञ्च में मोह जाल में तथा विषय विष में पटक कर साधक को सदा व्यथित करती रहती हैं । अतः सावधान होकर इन इन्द्रियों को वैराग्य शस्त्र के द्वारा मार देना चाहिये । 
गीता में कहा है कि- जिसकी इन्द्रियाँ जिसके वश में हैं उसकी बुद्धि भी ब्रह्म में स्थित रहती है । अन्यथा नहीं ।
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*काया कबज कमान कर, सार शब्द कर तीर ।*
*दादू यहु सर सांध कर, मारै मोटे मीर ॥३५॥*
स्थूल सूक्ष्म शरीर को संयमित रखना ही धनुष धारण करना है । विवेक वैराग्यादि गुणों से परिपूर्ण अन्तःकरण ही तूणीर है । जिसमें बाण संग्रहित रहते हैं । आसुरी दुर्गुण ही शत्रु स्थानीय है । अतः जब भी साधक के सामने कोई शत्रु युद्ध के लिये तत्पर हो तो उसी समय क्षमा आदि गुणों से क्रोध आदि शत्रुओं पर विजय पाने की साधक को चेष्टा करनी चाहिये । 
मुण्डक उपनिषद् में ब्रह्म बेधन के लिये कुछ भिन्न प्रकार से कल्पना करते हुए लिख रहे हैं कि- हे सौम्य ! उपनिषदों में वर्णित ओंकार रूप महास्त्र को यानी धनुष को लेकर उस पर उपासना द्वारा तीखा किया हुआ बाण चढ़ावे । फिर भावपूर्ण चित के द्वारा बाण को खींच कर उस अक्षर ब्रह्म को ही लक्ष्य मान कर बेधे । यहां पर ओंकार ही धनुष है । आत्मा ही शर है । ब्रह्म लक्ष्य है, प्रमाद रहित मनुष्य द्वारा बीधा जाने योग्य है । अतः उसे बेंध कर उस लक्ष्य में तन्मय होना चाहिये । इसी भाव को लेकर श्रीदादू जी महाराज कह रहे हैं कि- “काया कठिन कमान करि” इति ।
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*काया कठिन कमान है, खांचै विरला कोइ ।*
*मारै पंचों मृगला, दादू शूरा सोइ ॥३६॥*
सूक्ष्म शरीर का संयमन रूप धनुष धारण करना सर्वसाधारण मनुष्यों का काम नहीं है । जो गुरु के उपदेशरूपी वाक्यबाणों का अनुसंधान करते हैं वे ही उन बाणों के द्वारा पंचज्ञानेंद्रिय रूप मृगों को मार सकते हैं ।
अर्थात् इन्द्रियों को वासना रहित कर सकते हैं । वे ही वास्तविक शूरवीर कहलाते हैं । योगवासिष्ठ में शूरों के लक्षण बतला रहे हैं । शास्त्रों के आचारानुसार प्रभु के लिये(या राजा के लिये) रण में जो मरता है या विजयी होता है वह शूरवीर के लोकों में जाता है । जो सांसारिक धन के लिये युद्ध में क्षत होकर मरता है वह स्वर्गादि लोकों में नहीं जाता है । किन्तु दम्भी शूर है ।
शास्त्रानुसार लोकाचार का विचार करके विचारवान् पुरुषों से लड़ता । आत्मा अनात्मा का विचार करता है वह भक्त शूर कहलाता है अथवा सत्पुरुषों के लिये धर्म के लिये जो लड़ते हैं वे ही सच्चे शूरवीर होते हैं । शेष तो दाम्भिक शूर होते हैं ।
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*जे हरि कोप करै इन ऊपर, तो काम कटक दल जांहि कहाँ ।*
*लालच लोभ क्रोध कत भाजैं, प्रगट रहे हरि जहाँ तहाँ ॥३७॥*
कोई आशंका करता है कि हरि स्वयं ही साधक के अन्तःकरण में स्थित काम क्रोध आदि शत्रुओं का संहार क्यों नहीं कर देते जिस से साधना की आवश्यकता ही न रहे । उत्तर- हरि तो सर्वव्यापक हैं । उसके क्रोध से मारे हुए शत्रु भाग कर कहां जाय और हरि तो सर्वसमान है उसकी दृष्टि में न कोई शत्रु न मित्र है । किन्तु साधक की दृष्टि में ही क्रोध आदि दोष माने जाते हैं, अतः साधक को ही साधना द्वारा इनको हृदय से निकालने होंगे ।
(क्रमशः)

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