सोमवार, 21 दिसंबर 2020

*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ १३/१६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ १३/१६*
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वैष्णवे६ दरसनं धरमं, अघ हरन अंग परसनं ।
जल थल जीवन रांमं, जगजीवन हरि दरसनं६ ॥१३॥
(६-६, वैष्णव भक्ति में विष्णु मूर्ति के दर्शन धर्मप्रद, मूर्ति का स्पर्श अघनाशक तथा उसको चढ़ाया हुआ प्रसाद जीवनसार्थक माना गया है; परन्तु नाम-साधक के लिये भगवत्साक्षात्कार ही सब कुछ का दाता होता है ॥१३॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिस प्रकार वैष्णव धर्म में मूर्ति दर्शन ही अच्छा. मूर्ति के अंगों का स्पर्श पापहारी, चढाया गया जल व प्रसाद ही जीवन रक्षक माना जाता है । उसी प्रकार साधक के जीवन में भगवत्साक्षात्कार ही सब कुछ दायक है ।
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जगजीवन तिहुं लोक में, बड़ी चीज७ हरि नांम ।
सकल स्वाद सुख ऊपजै, पुरवै८ इच्छा कांम ॥१४॥
(७. बड़ी चीज=सर्वोत्तम) (८. पुरवै=पूर्ण करे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सबसे बड़ा हरिनाम है । जो सभी प्रकार के आनंद दे कर सभी ईच्छाओं की पूर्ति करनेवाला है ।
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उत्तर९ दक्खिन पूरब पच्छिम, च्यार कूंट फिर जोइ ।
जगजीवन हरि भगति बिन, सीतल कहूँ न होइ९ ॥१५॥ 
(९-९. चारों दिशाओं में हरिभक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय शीतलता प्रदान करने वाला नहीं है ॥१५॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चारों दिशाओं में ढूंढ कर देख लें प्रभु की हरि भक्ति बिना कोइ भी विधा जीव को शीतलता नहीं दे सकती है ।
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जगजीवन स्यंघल१० रमैं, नौ खंड प्रिथवी गाहि ।
(पुनि) रांम भगति बिन जीव की, मिटै न चित की चाहि ॥१६॥
{१०. स्यंघल=सिंहल(इस नाम का देश) । सुनते हैं वहाँ सत्येन्द्रनाथ का जन्म हुआ था ।}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो सिघल प्रदेश में है वह ही नो खण्ड पृथ्वी में हैं सिघंल प्रदेश में प्रभु भक्त सत्येन्द्रनाथ की भक्ति है । संत कहते हैं कि प्रभु की भक्ति के बिना कभी भी जीव की इच्छा पूर्ण नहीं होती है ।
(क्रमशः)

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