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*दादू होना था सो ह्वै रह्या, जे कुछ किया पीव ।*
*पल बधै न छिन घटै, ऐसी जानी जीव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मान लिई इक गोल कपोलन,*
*काढि रु सेव करी अति नीकी ।*
*होय गयो हरि रूप ततत्पर,*
*जोरि लिये कर बाहि कही की ॥*
*आइ दया मुर्छाय परे धर,*
*भक्ति भई अघ दारन पी१ की ।*
*काट लिई छटई अँगुरी उन,*
*जाय दिई दुखदायक जी की ॥५८॥*
व्याधों ने चन्द्रहास की उक्त बात मान ली । फिर चन्द्रहास ने अपने गाल से गोल शालग्राम की मूर्ति निकाली और बड़े प्रेम के साथ पूजा कर प्रभु का ध्यान किया । जब ध्यान में तत्पर होकर हरि के रूप ही हो गये तब दोनों हाथों में शालग्राम लेकर संकेत किया- अब तलवार बाह कर गर्दन काट दो ।
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चन्द्रहास की उक्त भक्ति तथा धैर्य आदि देखकर व्याधों के हृदय में अत्यन्त दया उत्पन्न हो गई । वे मुर्च्छित होकर पृथ्वी पर पड़ गये । जागने पर उनके हृदय में पाप को नष्ट करने वाली प्रियतम१ प्रभु की भक्ति उत्पन्न हो गई । फिर उन्होंने सोच विचार करके चन्द्रहास के एक पैर में छः अँगुली थी जो छठी अंगुली थी वह चन्द्रहास के लिये दुःख दायक अशुकन रूप थी, व्याधों ने काट लिया और ले जाकर धृष्टबुद्धि को दिखा दिया । उसे देखकर वह भ्रष्ट बुद्धि धृष्टबुद्धि बड़ा प्रसन्न हुआ और सोचने लगा-मैंने ऋषियों की भविष्य वाणी को भी मिथ्या बना दी है ।
(क्रमशः)

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