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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ६४/६६)
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*जोगी, जती, तपी, संन्यासी,*
*ते तौ परै हमारी पासी ।*
*चलि वेगि सो आरणि आऊ,*
*निश्चै ध्यान धर्यो तहां राऊ ॥६४॥*
योगी, जति, तपस्वी, संन्यासी, ये सब तो हमारी फांसी में फंसे पड़े हैं । अब हमको शीघ्र ही उस वन में चलना चाहिये जहां राजा वनवासी बनने का निश्चय कर ध्यान में बैठे हैं ॥६४॥
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*राणीयां राजा के पास*
*काहे पिय, मींची तुम्ह आंखी,*
*त्यागी क्यूं है महल की झांखी ।*
*सिंघ वघेरा वन के मांहीं,*
*अबै महल क्यूं चालो नांही ॥६५॥*
फिर वे सब राणियां राजा के पास जा पहुंची और ध्यानस्थ राजा को कहने लगी, हे पति देव आपने नेत्र बंद क्यों किये हैं, आपने महल का सुन्दर दृश्य क्यों त्याग दिया । इस वन में तो सिंघ, वघेरा आदि प्राणी रहते हैं । राजाओं का निवास तो महल ही है । आप अपने निवास स्थान महल में क्यों नहीं चलते ॥६५॥
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*राजा पदमसिंघ के ४२५ रानीयां*
*तुम बिन पीया महल उजारी(उजाड़ी),*
*सवा चारि सौ नारि तुम्हारी ।*
*कीजै भोग रु खुशी शरीरा,*
*मंदिर सौहैं माणिक हीरा ॥६६॥*
सवा चार सौ राणियां होते हुये भी आपके बिना महल उजड़ा सा हो गया है जो मंदिर महल में माणिक्य हीरा आदि से सुशोभित है उसमें रहकर शरीर के सुख का भोग करिये । इस वन में दु:ख क्यों भोग रहे हैं ॥६६॥
(क्रमशः)

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