रविवार, 27 दिसंबर 2020

= ४३१ =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग धनाश्री २७(गायन समय दिन ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४३१ - भयभीत भयानक । दीपचन्दी
डरिये रे डरिये, परमेश्वर तैं डरिये रे ।
लेखा लेवे, भर भर देवै, 
तातैं बुरा न करिये रे, डरिये ॥टेक॥
साचा लीजै, साचा दीजै, सांचा सौदा कीजै रे ।
साचा राखी, झूठा नाखी, विष ना पीजी रे ॥१॥
निर्मल गहिये, निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजै, निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥२॥
साह पठाया, बनिजन आया, जनि डहकावै रे ।
झूठ न भावै, फेरि पठावै, किया पावै रे ॥३॥
पँथ दुहेला, जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला होइ सुहेला, सो कुछ कीजी रे ॥४॥
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४३१ - ४३२ में कह रहे हैं - भयानक कर्मों से तथा परमेश्वर से डरते रहना चाहिये, हम बारम्बार कहते हैं - हृदय में ईश्वर का भय रख कर ही जीवन यापन करो, क्योंकि - वे प्रभु जीवन का हिसाब लेते हैं और कर्मों के अनुसार ही अन्त:करण में भावी जन्म का विधान तथा सँस्कार भर कर जन्म प्रदान करते हैं । इसलिये बुरे कर्म न करो ।
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सत्य को हृदय में रखकर, वस्तु लो और दो, सत्य का ही व्यापार करो । सत्य प्रभु का ही चिन्तन हृदय में रक्खो, मिथ्या का चिन्तन त्यागो । विषय - विष का पान मत करो ।
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शुद्ध ब्रह्म को ही उपास्य रूप से ग्रहण करो, निर्विकार रहो, निर्मल ब्रह्म का नाम उच्चारण करो, शुद्ध ब्रह्म सम्बन्धी उपदेश लो और दो । ब्रह्म - चिन्तन से भिन्न विषय - वासनादि में वृत्ति मत जाने दो ।
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प्रभु ने तुम्हें भेजा है, तुम सत्य का व्यापार करने आये हो, विषयों से बहको मत । प्रभु को मिथ्या विषयों का व्यापार अच्छा नहीं लगता । यदि तुम विषय - व्यापार में ही जीवन व्यतीत करोगे तो प्रभु तुम्हें फिर चौरासी में भेजेंगे और तुम अपने किये कर्मों का फल पाओगे ।
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प्रभु प्राप्ति का मार्ग अति कठिन है, उसमें एकाकी जाना पड़ता है । अत: निषिद्ध तथा शुभ सकाम कार्मों का भार मत उठाओ, जो कुछ करो वह निष्काम भाव से करो और वैसा ही विचार करो, जिससे आत्मा और ब्रह्म का अभेद रूप मिलन सुगम हो ।
(क्रमशः)

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