रविवार, 27 दिसंबर 2020

*रामनाम और ईश्वर चिंतन*

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*सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तजि आसा ।*
*दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २५१)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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“एक आदमी के एक लड़की थी । बहुत कम आयु में लड़की विधवा हो गयी थी । पति का मुख उसने देखा था । दूसरी स्त्रियों के पतियों को आते-जाते वह देखती थी । उसने एक दिन कहा, ‘पिताजी, मेरा पति कहाँ है ?’ उसके पिता ने कहा, ‘गोविन्दजी तेरे पति हैं । उन्हें पुकारने पर वे तुझे दर्शन देंगे ।’ यह सुनकर वह लड़की द्वार बन्द करके गोविन्द को पुकारती और रोती थी । वह कहती थी – ‘गोविन्द ! तुम आओ, मुझे दर्शन दो, तुम क्यों नहीं आते ?’ छोटी लड़की का यह रोना सुनकर गोविन्दजी स्थिर न रह सके । उसे उन्होंने दर्शन दिए ।
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“बालक जैसा विश्वास । बालक माँ को देखने के लिए जिस तरह व्याकुल होता है वैसी व्याकुलता चाहिए । इस व्याकुलता के होने पर समझना चाहिए कि अरुणोदय हुआ । इसके बाद सूर्योदय होगा ही । इस व्याकुलता के बाद ही इश्वर दर्शन होता है ।
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“जटिल बालक की कथा आती है । वह पाठशाला जाता था । कुछ जंगल की राह से पाठशाला जाना पड़ता था; इसलिए वह डरता था । उसने अपनी माँ से यह कहा । माता ने कहा, ‘डर क्या है ? तू मधुसूदन को पुकारना ।’ बच्चे ने पूछा, ‘मधुसूदन कौन है ?’ माता ने कहा, ‘मधुसूदन तेरे दादा होते हैं ।’ 
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जब अकेले में जाते समय वह डरा, तब एक आवाज लगायी – ‘मधुसूदन दादा !’ कहीं कोई न आया । तब वह, ‘कहाँ हो मधुसूदन दादा ! जल्दी आओ, मुझे बड़ा डर लग रहा है’ कहकर जोर जोर से पुकारते हुए रोने लगा । मधुसूदन ने रह सके । आकर कहा, ‘यह हैं हम, तुझे भय क्या है ?’ यह कहकर उसे साथ लेकर वे पाठशाला के रास्ते तक छोड़ आए, और कहा, ‘तू जब बुलाएगा तभी मैं दौड़ा जाऊँगा, भय क्या है ?’ यही बालक का विश्वास है ! यही व्याकुलता है ! 
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“एक ब्राह्मण के यहाँ भगवान् की सेवा होती थी । एक दिन किसी काम से उसे किसी दूसरी जगह जाना पड़ा । वह अपने छोटे बच्चे से कह गया, ‘आज श्रीठाकुरजी का भोग लगाना, उन्हें खिलाना ।’ बच्चे ने ठाकुरजी का भोग लगाया, परन्तु ठाकुरजी चुपचाप बैठे ही रहे । न बोले और न कुछ खाया ही । बच्चे ने बड़ी देर तक बैठे बैठे देखा कि ठाकुरजी नहीं उठते । उसे दृढ़ विश्वास था कि ठाकुरजी आकर आसन पर बैठकर भोजन करेंगे । 
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वह बार बार कहने लगा, ‘ठाकुरजी, आओ, भोग पा लो, बड़ी देर हो गयी अब और मुझसे बैठा नहीं जाता ।’ ठाकुरजी क्यों उत्तर देने लगे? तब बच्चे ने रोना-शुरू कर दिया; कहने लगा, ‘ठाकुरजी, पिताजी तुम्हें खिलाने के लिए कह गए हैं, तुम क्यों नहीं आओगे ? क्यों मेरे पास नहीं खाओगे ? व्याकुल होकर ज्यों ही कुछ देर तक वह रोया कि ठाकुरजी हँसते हँसते आकर हाजिर हो गए और आसन पर बैठकर भोग पाने लगे । 
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ठाकुरजी को खिलाकर जब वह ठाकुरघर से निकला, तब घरवालों ने कहा, ‘भोग हो गया तो वह सब उतार ले आ ।’ बच्चे ने कहा, ‘हाँ, हो गया; ठाकुरजी ने सब भोग खा लिया ।’ उन लोगों ने कहा, ‘अरे, यह तू क्या कहता है ! बच्चे ने सरलतापूर्वक कहा, क्यों खा तो गए हैं ठाकुरजी सब ।’ यब घरवालों ने ठाकुर घर में जाकर देखा तो छक्के छूट गए ।”
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सन्ध्या होने को अभी देर है । श्रीरामकृष्ण नौबतखाना के दक्षिण ओर खड़े हुए मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं । सामने गंगा है । जाड़े का समय है । श्रीरामकृष्ण ऊनी कपड़ा पहने हुए हैं ।
श्रीरामकृष्ण – पंचवटीवाले घर में सोओगे ?
मणि – क्या ये लोग नौबतखाना के ऊपर का कमरा न देंगे ?
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श्रीरामकृष्ण खजांची से मणि की बात कहेंगे । रहने के लिए एक कमरा ठीक कर देंगे । मणि को नौबतखाने के ऊपर का कमरा पसन्द आया है । वे हैं भी कविता प्रिय मनुष्य । नौबतखाने से आकाश, गंगा, चाँदनी, फूलों के पेड़ ये सब दीख पड़ते हैं ।
श्रीरामकृष्ण – देंगे क्यों नहीं ? मैं पंचवटीवाला घर इसीलिए कह रहा हूँ कि वहाँ बहुत रामनाम और ईश्वर चिंतन किया गया है ।
(क्रमशः)

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