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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
*ऊपरि आलम सब करैं, साधू जन घट माँहि ।*
*दादू एता अन्तरा, ताथैं बनती नांहि ॥*
*दादू एता अन्तरा, ताथैं बनती नांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*स्वांग का अंग १३२*
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षट्दर्शन१ भरु खलक२ सब, पाले३ पर चित्राम ।
रज्जब रवि सुत परसतैं, घट पट४ भागे धाम ॥८९॥
जोगी जंगामादि छ: प्रकार के भेषधारी१ और सब संसार२ बर्फ३ राशि पर लिखित चित्राम के समान हैं । जैसे बर्फ राशि पर का चित्राम सूर्य के तेज धाम के स्पर्श होते ही नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही सूर्य पुत्र यमराज के आते ही शरीर तथा भेष४ भाग जाते हैं अर्थात काल के आगे भेष का कोई महत्व नहीं रहता, भजन साधन का ही रहता है ।
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परम१ स्वांग२ ले सांच का, आदि अंत जो होय ।
जन रज्जब क्या कीजिये, जो दीसै दिन दोय ॥९०॥
जो आदि, मध्य और अंत सर्वकाल में रहता है वह सत्य ही श्रेष्ठ१ भेष२ है, उसे ग्रहण कर, जो केवल दो दिन दिखाई देता है, उस भेष का क्या करेगा ?
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बिना शशिहर१ शशिहर किया, जैनहु ने जग माँहिं ।
तैसे शशिहर स्वाँग, सो रज्जब माने नाँहिं ॥९१॥
जैन यति ने जगत में बिना चन्द्रमा१ ही चन्द्रमा दिखा दिया किंतु वह बनावटी चन्द्रमा सत्य तो नहीं माना गया । वैसे ही स्वांग के साधु को हम सच्चा संत नहीं मानते ।
दृष्टान्त - किसी नरेश की सभा में एक जैन यति था, राजा ने उनसे पूछा - 'आज कौन तिथि है ।' यति ने भंग के नशे में अमावस्या को पूर्णिमा बता दिया । नरेश ने कहा - 'पूर्णिमा होगी तो चन्द्रोदय भी होगा ?' यति ने कहा - "अवश्य होगा । " यति अपने आश्रम पर गया, नशा उतरने पर साथी ने राजा के पास हुई बात सुनाई तब यति ने अपनी बात सत्य करने के लिये बनावटी चन्द्रमा आकाश में चढाया, उसे देखकर नरेश ने चारों ओर घुड़ सवार भेज कर पता लगवाया, उसका प्रकाश चारों ओर १२-१२ कोस तक था ।
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साँचा शशिहर साँच का, सकल हिं लोक प्रकाश ।
रज्जब शशिहर स्वांग का, द्वादश कोस उजास ॥९२॥
बनावटी चन्द्रमा का प्रकाश तो १२-१२ कोस में ही था किंतु सच्चे चन्द्रमा का सच्चा प्रकाश सभी लोकों में होता है । वैसे ही भेष के साधु की पोल खुलती है और सच्चा साधु सब स्थानों में एक रस रहता है ।
(क्रमशः)

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