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*ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।*
*साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*देश पती कछु भूप न पावत,*
*फौज दिई रु दिवान पठायो ।*
*आन मिल्यो वह जान लियो उन,*
*मारन को इक फैम१ उपायो ॥*
*कागद हाथ दियो सुत दीजिये,*
*बात करो वह मोहि खिनायो ।*
*पास गयो पुर बाग विराज रु,*
*सेव करी फिर शैन करायो ॥६०॥*
चन्दनपुर राज्य की ओर से कुन्तलपुर को दश हजार स्वर्ण मुद्रायें ‘कर’ के रूप में प्रति वर्ष दी जाती थीं । इधर चन्द्रहास ने पुण्य कर्मों में अधिक खर्च किया, इससे वे नहीं भेजी जा सकीं । तब कुन्तलपुर नरेश ने अपने प्रधान मन्त्री धृष्टबुद्धि को कुछ सेना के साथ चन्दनपुर भेजा, वहां राजकुमार चन्द्रहास भी आकर धृष्टबुद्धि से मिला । तब धृष्टबुद्धि उसको पहचान गया और उसको मारने के लिए एक षड़यंत्र रूप विचार१ रचा ।
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राजा कुलिन्दक से कहा- मेरा एक परम आवश्यक कार्य है, उसके लिये मैं विचार करता हूँ, चन्द्रहास उसे कर आयेगा । राजा ने कहा- ठीक है चन्द्रहास मेरा भी पूरा विश्वास पात्र है, भेज दें । धृष्टबुद्धि ने पत्र देकर चन्द्रहास को कहा- तुम स्वयं पत्र लेकर कुन्तलपुर जाओ । पत्र मार्ग में खुलने नहीं पावे, अन्य कोई इसमें लिखी बात न जान पाये । इसे मेरे पुत्र मदन को ही देना और उससे यह बात कहना कि- इसमें जो कार्य लिखा है सो बिना कुछ विचारे ही शीघ्र कर दो । इसीलिये ही मेरे को भेजा है । चन्द्रहास घोड़े पर चढ़कर चले और कुन्तलपुर के पास पहुँच गये, मार्ग में धृष्टबुद्धि का ही बाग आ गया, उसमें जाकर घोड़े को बांधा तथा ठहरकर भगवान् की सेवा-पूजा की, फिर मध्यान्ह होने पर वहां ही सो गये ।
(क्रमशः)

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