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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ २१/२४*
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कहि जगजीवन देह जर, आतम चेतन भाव ।
रांम भगति करि यूं तिरै, ज्यूं नीर परसपर नाव ॥२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह में तो जरा अवस्था व्यापति है किन्तु आत्मा का भाव चेतन ही रहता है । और ये प्रभु भक्ति से इस प्रकार पार पाता है जैसे नाव पर सवार व्यक्ति दरिया से पार हो जाता है ।
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भगति३ बड़ी भावै बड़ी, छाया बड़ी निवास ।
नाव बड़ी निज आतमा, सु कहि जगजीवनदास३ ॥२२॥
{३-३. श्रद्धा भाव से ही भक्ति की महत्ता है । अर्थात् जितनी अधिक श्रद्धा होती है चित्त उतना ही अधिक भक्ति में रहता है । अपने घर की छाया ही सुखद होती है । इस साधना में आत्मा(स्वकीय शुद्ध ह्रदय) ही सर्वोत्तम उपाय माना जाता है ॥२२॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भक्ति में नियम से भी अधिक महत्ता श्रद्धा की है यह जितनी अधिक होगी उतना ही चित लगेगा । अपने घर की परछाई भी सुखद होती है । फिर घर की तो बात ही क्या ? इस जीवन में श्रेष्ठ घर शुद्ध हृदय ही माना गया है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, जब लग दादू दास ।
इस असथल आमा पुरी४, आनंद भगति निवास ॥२३॥
{४. आमा पुरी=आमेर(जयपुर राज्य की पुरानी राजधानी)}
संतजगजीवन जी अहते हैं कि जब तक देह में, आत्मा में दादू जी महाराज का नाम है तब ही देह सुखी है जहाँ आमेर में दादू जी महाराज विराजते थे वहां ही सम्पूर्ण भक्ति का स्त्रोत है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, सब जाण्यां तुम जांण ।
नाउं निरंजन राखि चित, प्रेम भगति प्रवांण ॥२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आपको जान लेने से, आपकी महिमा जान लेने से सब ज्ञात हो जाता है । सदा नाम स्मरण चित में रहे तो प्रेम भक्ति सफल हो जाती है ।
(क्रमशः)

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