🌷🙏*🇮🇳 #daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
*जन्म लगै व्यभिचारणी, नख शिख भरी कलंक ।*
*पलक एक सन्मुख जली, दादू धोये अंक ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*स्वांग का अंग १३२*
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मृतक घोड़ी स्वांग की, तिहि चढ गर्वे जीव ।
पवंग१ पलाणा२ काठ का, क्यों पहुंचेंगे पीव ॥९३॥
जैसे कोई मरी हुई घोड़ी पर चढ़कर धुड़सवार होने पर गर्व करे, वैसे ही भेष बना कर साधुता का गर्व करना है । जिसका घोड़ा१ और जीन२ दोनों काष्ठ के ही हो वह जाने योग्य स्थान को कैसे पहुँचेगा ? वैसे ही भेष से प्रभु के पास कैसे पहुँचेगा ?
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बाना१ बकतर२ पहिर कर, लड़ै सकल संसार ।
जन रज्जब सो सूरमा, जो झूझे निरधार३ ॥९४॥
कवच२ पहन कर तो सभी संसार के योद्धा लड़ते हैं किंतु सच्चा शूर तो वही है जो कवच का आधार न लेकर लड़ता है । वैसे ही भेष१ से तो सभी साधु बनते हैं किंतु भेष बिना निराधार३ ही जो मन से युद्ध करते हैं वे ही सच्चे संत हैं ।
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श्रृंगार सहित होली जली, रह्यो प्रीति प्रहलाद ।
सो रज्जब जाने जगत, कहां स्वांग परि वाद ॥९५॥
होली श्रृंगार से युक्त थी तो भी जल गई और बिना श्रृंगार के केवल प्रभु होने से प्रहलाद जलने से बच गया, सो बात सभी जगत जानता है, तब भेष की श्रेष्ठता पर विवाद करना क्या शेष रह जाता है ? अर्थात भेष से साधन श्रेष्ठ है ।
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हरि बिन होली थम्भ ज्यों, माला मेलि हजार ।
रज्जब रहै२ न इस मतै१, जल बल होसी छार ॥९६॥
हरि चिन्तन बिना गले में होली स्थम्भ के समान हजारों माला पहनाई जाय तो भी क्या ? इस विचार१ से तो काल से ही नहीं बच२ सकता, जैसे हजारों माला पहन कर होली का स्थंभ जल कर भस्म हो जाता है, वैसे ही अन्त काल के मुख में जायेगा, प्रभु को प्राप्त नहीं हो सकता ।
(क्रमशः)

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