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*सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव ।*
*साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*आय कहा सु मदन्न मुवो मठ,*
*कांपि उठ्यो रु झरी दृग लागी ।*
*देख पर्यो शिर पाथर फोरत,*
*मृत्यु भई समझ्यो न अभागी ॥*
*चन्दरहास चले मठ पास हू,*
*मात हि अंग चढावत रागी ।*
*मात कहै तब मैं अरि मारत,*
*होय सजीव उठे बड़ भागी ॥६५॥*
किसी ने आकर धृष्टबुद्धि को कहा- देवी के मठ में मदन मारा गया । यह सुनते ही धृष्टबुद्धि का शरीर कांपने लगा, नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी । इसी अवस्था में यह देवी के मन्दिर में पहुँचा । वहाँ मरे हुये मदन को पड़ा देखकर अति व्याकुलता से अपने मस्तक को पत्थर से फोड़कर मर गया, किन्तु मरने तक भी अभागा अपनी भूल को नहीं समझ सका । जब चन्द्रहास ने दोनों की मृत्यु देवी के मन्दिर में होने की बात सुनी तो वे देवी के मन्दिर में गये और उनको पड़े देखकर अपना मस्तक देवी के चढ़ाने लगे ।
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उन भगवान् के प्रेमी भक्त चन्द्रहास को मस्तक चढ़ाते देख के देवी ने प्रकट होकर उन्हें रोकते हुये कहा ये तो तुम्हारे शत्रु थे, इसिलिए मैंने इनका नाश किया है । यद्यपि मदन शत्रु नहीं था किन्तु तुम्हारे विवाह के समय उसने अपना शरीर तुम्हारे समर्पण किया था सो वे अब ऋण से मुक्त हो गये हैं । चन्द्रहास बोले- मेरा कोई भी शत्रु नहीं । देवी बोली- मैं तुम पर प्रसन्न हूँ तुम वर माँगो । चन्द्रहास बोले- यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें- श्री हरि में मेरी सदा अचल भक्ति रहे, धृष्टबुद्धि के अपराध को क्षमा करें, इन दोनों को जीवित करें तथा इनका मेरे में शत्रु भाव नहीं रहे । तथा बड़ भागी भी बने रहें अर्थात् इनको भावी जीवन में भी दुःख नहीं हो । देवी तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गई । धृष्टबुद्धि और मदन जीवित हो गये तथा दोनों ने चन्द्रहास का बड़ा आदर किया ।
(क्रमशः)

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