सोमवार, 28 दिसंबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग धनाश्री २७(गायन समय दिन ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४३२ - दीपचन्दी
डरिये रे डरिये, देख देख पग धरिये ।
तारे तरिये मारे मरिये, 
तातैं गर्व न करिये रे, डरिये ॥टेक॥
देवै लेवै समर्थ दाता, सब कुछ छाजै रे ।
तारै मारै गर्व निवारै, बैठा गाजै रे ॥१॥
राखैं रहिये बाहैं बहिये, अनत न लहिये रे ।
भानैं घड़ै संवारैं आपै, ऐसा कहिये रे ॥२॥
निकट बुलावै दूर पठावै, सब बन आवै रे ।
पाके काचे काचे पाके, ज्यों मन भावै रे ॥३॥
पावक पाणी पाणी पावक, कर दिखलावै रे ।
लोहा कंचन कंचन लोहा, कहि समझावै रे ॥४॥
शशिहर सूर सूर तैं शशिहर, परगट खेलै रे ।
धरती अम्बर अम्बर धरती, दादू मेलै रे ॥५॥
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पाप कर्म और परमात्मा से डरते रहो, पृथ्वी को देख २ कर पैर धरो वो पुन: २ विचार करके शुभ कर्मों में वृत्ति लगाओ । ईश्वर उद्धार करे तब ही प्राणी का उद्धार होता है और वे मारें तो मरण होता है । इसीलिये गर्व न करके ईश्वर से डरते रहना चाहिए ।
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वे प्रभु उदार और तारने - मारने तथा गर्व नष्ट करने में समर्थ हैं, सदा स्थिर बैठे गर्जना करते हैं । प्राणियों की भावना ग्रहण करते हैं तथा कर्मानुसार फल देते हैं । उनको सभी कुछ शोभा देता है ।
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उनके रखने से प्राणी स्थिर रहता है, चलाने से चलता है । वे स्वयँ ही सब को नष्ट करते हैं, बनाते हैं और सुधारते हैं । सँत और शास्त्र उनके विषय में ऐसा ही कहते हैं । अत: अन्य को उपास्य रूप से ग्रहण न करो ।
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वे समीप बुलाते हैं, दूर भेज देते हैं । उनके द्वारा सभी कुछ होता है ।
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यदि उनके मन को अच्छा लगे तो वे पक्के को कच्चा और कच्चे को पक्का कर देते हैं । अग्नि को जल, जल को अग्नि, लोहे को सुवर्ण, सुवर्ण को लोहा करके दिखा देते हैं । ऐसा कह - कह कर प्रभु की समर्थता समझा रहे हैं ।
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वे चन्द्र से सूर्य, सूर्य से चन्द्र बना कर प्रकट रूप से उनके साथ खेल सकते हैं । उन्होंने पृथ्वी को आकाश में और आकाश को पृथ्वी पर अधर धर रखा है, उसकी लीला अपार है ।
(क्रमशः)

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