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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*सब घट एकै आत्मा, जानै सो नीका ।*
*आपा पर में चीन्ह ले, दर्शन है पीव का ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा -सिन्धु ---------दया
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भंयकर आकाल का समय था, एक श्रीमान उबाले हुये चने एक एक अंजलि सब को देता था । एक गरीब जिसके पास चने लेने को भी कुछ न था, तन पर एक कौपीन मात्र थी, अन्नक्षेत्र से अपनी अंजली में चने लेकर किसी वृक्ष की छाया में जा रहा था । मार्ग में एक नव प्रसूता नारी ने उससे पूछा - अन्न क्षेत्र बंद तो नहीं हुआ ? उसने यह सोचकर कि बंद हो गया । ऐसा कहने से भूख से व्याकुल इन दोनों की मृत्यु हो जायेगी और यदि मैं अपना अन्न इसे दे देता हूँ तो मैं एक ही मरूंगा, कहा - तुम्हारे हिस्से का मैं ले आया हूँ लो । स्त्री ने चने लिये और वे दोनों बच गये तथा भिक्षु भूख से पीडित होकर मर गया । उपयुक्त दया के प्रताप से दूसरे जन्म में मान्धाता नाम चक्रवती राजा हुआ ।
भूखे प्यासे पर दया, करे महाफल होय ।
मान्धाता भूपित भया, पूर्व रंक था सोय ॥१२९॥
(क्रमशः)

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