बुधवार, 23 दिसंबर 2020

= *स्वांग का अंग १३२(७७/८०)* =

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*दादू झूठा राता झूठ सौं, साँच राता साँच ।*
*एता अंध न जानहिं, कहँ कंचन, कहँ काँच ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*स्वांग का अंग १३२*
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बाने१ को बींदे२ नहीं, सब संतन का साखि३ । 
रज्जब राखै कौन विधि, पूज्य पुकारे नाखि४ ॥७७॥
भेष१ के आग्रह में कोई न फँसे२, यही सब संतों की साक्षी३ है, जब पूज्य 
संत भेष का आग्रह त्यागने४ के लिये पुकार कर कह रहे हैं तब हम किस प्रकार रख सकते हैं । 
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मन मंयक१ सम नीकसै, अबला२ आदित्य छाँहि । 
जन रज्जब वंदहि३ सु क्यों४, बाने५ बादल माँहिं ॥७८॥
मन चन्द्रमा१ के समान है, चन्द्रमा जब सूर्य की छाया में अर्थात सूर्य के होते हुये द्वितिया को निकलता है और बादल में होता है तब उसे कैसे प्रणाम करैं ? अर्थात उसकी कला देखकर ही तो प्रणाम३ करते हैं, वह दिखती नहीं । वैसे ही मन नारी२ की छाया में निकलता अर्थात नारी के अधीन रहता है और भेष५ के आग्रह में भी दबा रहता है, तब वह कैसे४ वंदनीय३ होगा ? उसकी साधन शक्ति तो भासती ही नहीं । 
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रज्जब रहै न स्वाँग१ में, बाने२ बंद३ हिं नाँहिं । 
आतम राम न सूझ ही, भेष भाकसी४ माँहिं ॥७९॥
हम भेष१ के आग्रह में नहीं रहते, न भेष२ को वंदन३ करते । भेष के आग्रह रूप कैद४ में घुसने पर तो अपना आत्म स्वरूप राम नहीं दीखता । 
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षट् दर्शन१ के दृग नहीं, भेषों भाने२ नैन । 
आतम राम न सूझ ही, रज्जब परे न चैन३ ॥८०॥
जोगी, जंगामादि छ: प्रकार के भेषधारियों१ के विचार रूप नैत्र नहीं है, भेषों के आग्रह ने फोड़२ डाले हैं । इसी से उन्हें आत्मस्वरूप राम नहीं दीखता और न शांति-सुख३ मिलता ।
(क्रमशः)

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