बुधवार, 23 दिसंबर 2020

*अध्यात्मरामायण*

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*जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ ।*
*जहँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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परिच्छेद ६१ 
*दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ*
(१)
*अध्यात्मरामायण*
आज अगहन की पूर्णिमा और संक्रान्ति हैं । दिन शुक्रवार १४ दिसम्बर १८८३ । दिन के नौ बजे होंगे । श्रीरामकृष्णअपने कमरे के दरवाजे के पास दक्षिण-पूर्व के बरामदे में खड़े हैं । पास ही रामलाल खड़े हैं । राखाल और लाटू भी कहीं इधर-उधर पास ही थे । मणि ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया । 
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श्रीरामकृष्ण ने कहा “आ गए, अच्छा हुआ । आज दिन भी अच्छा है ।” मणि कुछ दिन श्रीरामकृष्णके पास रहेंगे । साधना करेंगे । श्रीरामकृष्ण ने कहा है, “थोड़ी साधना करते ही कोई आकर तुम्हें बता देगा, ऐसा ऐसा करो ।”
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श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा है, “यहाँ अतिथिशाला का अन्न तुम्हारे लिए रोज खाना उचित नहीं । यह साधुओं और कंगालों के लिए है । तुम अपना भोजन पकाने के लिए एक आदमी ले आना ।” इसीलिए उनके साथ एक आदमी भी आया है ।
उनका भोजन कहाँ पकाया जाएगा, इसकी व्यवस्था कर दी गयी । वे दूध पीएँगे, इसके लिए श्रीरामकृष्ण ने रामलाल को अहीर से कह देने को कहा ।
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रामलाल “अध्यात्मरामायण’ पढ़ रहे हैं और श्रीरामकृष्ण सुन रहे हैं । मणि भी बैठे हुए सुन रहे हैं- ‘श्रीरामचन्द्रजी सीताजी से विवाह करके अयोध्या लौट रहे हैं । रास्ते में परशुराम से भेंट हुई । श्रीरामचन्द्र ने शिव का धनुष तोड़ डाला है, यह सुनकर परशुराम रास्ते में बड़ा गुलगपाड़ा मचाने लगे । मारे भय के दशरथ के होश ही उड़ गए । परशुराम ने एक दूसरा धनुष राम को देकर उस पर उन्हें गुण चढ़ा देने के लिए कहा । 
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राम ने कुछ मुसकराकर बायें हाथ से धनुष लेकर गुण चढ़ाकर उसमें टंकार किया । शरासन में शरयोजना करके परशुराम से उन्होंने कहा, अब यह बाण कहाँ छोडूँ – कहो । परशुराम का दर्प चूर्ण हो गया । वे रामचन्द्र को परब्रह्म कहकर उनकी स्तुति करने लगे ।”
परशुराम की स्तुति सुनते ही सुनते श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया । रह-रहकर, ‘राम राम’ नाम का मधुर उच्चारण कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण(रामलाल से) – जरा गुह-निषाद की कथा तो सुनाओ । रामलाल “भक्तमाल’ से सुनाते रहे-
“श्रीरामचन्द्र जब पिता की सत्यरक्षा के लिए वन गए थे, तब उन्हें देखकर निषादराज को बड़ा आश्चर्य हुआ । उनके नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी; गला रुँधे आया और वे काठ की बनी पुतली की तरह निःस्पन्द होकर अनिमेष दृष्टि से एकटक देखते रहे । धीरे धीरे उन्होंने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर कहा, ‘आप हमारे घर चलें ।’ 
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श्रीरामचन्द्र उन्हें मित्र कहकर भर बाँह भेंटे । निषाद ने आत्मसमर्पण करते हुए कहा, ‘आप मेरे मित्र हुए तो मैं भी आपको अपने प्राणों के साथ अपनी देह समर्पित करता हूँ । आप ही मेरे प्राण, धन, राज्य हैं, आप ही मेरी भक्ति, मुक्ति हैं, आप मेरे सर्वस्व हैं । आपके चरणों में मैं देहसमर्पण करता हूँ ।’
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“श्रीरामचन्द्र चौदह साल वन में रहेंगे और जटा-वल्कल धारण करेंगे, यह सुनकर निषादराज ने भी जटा-वल्कल धारण कर लिया । फल-मूल छोड़कर अन्य कोई भोजन उन्होंने नहीं किया । चौदह साल के बाद भी श्रीरामचन्द्र नहीं आ रहे हैं यह देखकर गुह अग्निप्रवेश करने जा रहे थे । इसी समय हनुमानजी ने आकर संवाद दिया । संवाद पाकर गुह आनन्दसागर में मग्न हो गए । श्रीरामचन्द्र और सीतामाई पुष्पक पर आकर उपस्थित हो गए ।
(क्रमशः)

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