सोमवार, 21 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ३९/४२

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ३९/४२)
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*॥ सूरातन ॥*
*दादू तन मन काम करीम के, आवै तो नीका ।*
*जिसका तिसको सौंपिये, सोच क्या जी का ॥३९॥*
जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया, और बनाया है, यदि उसकी भक्ति के काम में आ जाये तो सबसे अच्छा शरीर का उपयोग हो गया । अतः साधक को योगक्षेमादिक की चिन्ता त्याग कर इस शरीर से भगवान् की भक्ति ही करनी चाहिये । भक्त का योगक्षेम तो भगवान् स्वयं ही चलाते हैं ।
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*जे शिर सौंप्या राम को, सो शिर भया सनाथ ।*
*दादू दे ऊरण भया, जिसका तिसके हाथ ॥४०॥*
यह शरीर जिसका है उसके लिये यदि समर्पण कर दिया जाये तो वह शरीर सनाथ हो गया । जीव तो प्राप्त वस्तु को भगवान् के अर्पण करके अपने कर्तव्य का पालन करता है । जीव तो इतना ही कर सकता है इस से अधिक और वह क्या कर सकता है । इतना कर देने से उस का साधुत्व भी संपन्न हो जाता है । अतः जीव इस शरीर से भगवान् की भक्ति करके कृतकृत्य हो जाता है ।


*जिसका है तिसको चढै, दादू ऊरण होइ ।*
*पहली देवै सो भला, पीछे तो सब कोइ ॥४१॥*
जीवित अवस्था में ही उसकी वस्तु को उसके समर्पण कर देने से वह जीव दानी कहलाता है । अन्त में तो जबरदस्ती से छीन लिया जायेगा । इससे जीव को कोई यश भी प्राप्त नहीं हो सकेगा और न शरीर की सफलता ही होगी अतः बलिराजा की तरह पहले ही भगवान् के अर्पण करके अपने कर्तव्य से भी उऋण हो जायेगा ।
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*सांई तेरे नाम पर, शिर जीव करूं कुर्बान ।*
*तन मन तुम पर वारणै, दादू पिंड पराण ॥४२॥*
हे ईश्वर ! मैं आपके लिये अहंकार रूपी शिर मन प्राणपिण्ड यह सब आपको समर्पण कर रहा हूँ । आज से जो मेरा है वह सब आपका है । मैं तो आपका दास हूँ मेरे ऊपर दया कीजिये और इन सब को ग्रहण कीजिये । यहां पर यह रहस्य है कि-भगवान् के लिये यदि दुष्कर कार्य भी करना पड़ जाये तो उससे विमुख नहीं होना चाहिये, क्योंकि प्रभु को दी हुई वस्तु आगे आपको फिर मिल जायेगी । अतः उत्साहपूर्वक उसका दान कर देना चाहिये । यदि शिर के दान से परभी मिलता है तो उसके लिये शीघ्र ही देहाध्यास को त्याग कर शर दे देना चाहिये । 
(क्रमशः)

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