शनिवार, 26 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ५५/५८

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ५५/५८)
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*सबै कसौटी शिर सहै, सेवक सांई काज ।*
*दादू जीवन क्यों तजै, भाजे हरि को लाज ॥५५॥*
प्रभु प्राप्ति के लिये तितिक्षा द्वारा सभी कष्टों को सहन करना चाहिये और उन दुःखों से दुःखित होकर हरि भक्ति को नहीं त्यागना चाहिये । अन्यथा हरि को लाज आती है कि मेरा भक्त होकर भी दुःखों से डरता है । 
गीता में- हे कुन्तीपुत्र ! सर्दी गर्मी तथा सुख दुःखों को देने वाली इन्द्रियाँ और विषयों के संयोग से उत्पत्ति विनाशशील है । जगत् में ऐसा कौन है जो सदा ही सुखी या दुःखी रहता है । सुख दुःख तो रथ के चक्र की तरह आते जाते रहते हैं । अतः साधक को इन से डरना नहीं चाहिये ।
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*सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव ।*
*दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥५६॥*
परमात्मा की प्राप्ति के लिये सब भोगों और वासना को त्याग देना चाहिये । यदि उनके त्यागने से शरीर क्षीण होता है तथा मन को दुःख हो तो होने दो । क्योंकि शरीर तो अवश्य जर्जर होगा । अतः उससे क्या ममता करनी । शरीर तो बार-बार मिलते ही रहते हैं । लेकिन हरि भक्ति तो दुर्लभ है । उसको नहीं छोड़ना चाहिये ।
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*॥ पतिव्रत निष्काम ॥*
*दादू सेवक सो भला, सेवै तन मन लाइ ।*
*दादू साहिब छाड़ कर, काहू संग न जाइ ॥५७॥*
*पतिव्रता निज पीव को, सेवै दिन अरु रात ।*
*दादू पति को छाड़ कर, काहू संग न जात ॥५८॥*
जैसे पतिब्रता नारी पति सेवा को त्याग कर किसी अन्य कार्य में आसक्त नहीं होती । प्रत्युत दिन रात प्रतिक्षण पतिसेवा में लगी रहती है । वह ही उसका मुख्य कर्तव्य है । वह अपने पति को त्याग नहीं सकती क्योंकि उसको वह प्राणों से भी अधिक प्यारा है । ऐसे ही सेवक शरीर मन वाणी से भगवान् की सेवा करता हुआ किसी प्रकार की विषय वासना को नहीं चाहता । ऐसा भक्त ही हरि का प्यारा होता है । 
श्री मद्भागवत में कहा है कि- जिस क्षण साधक मन में स्थित सारी कामनाओं को त्याग देता है तब ही वह हरि को प्राप्त कर सकता है ।
(क्रमशः)

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