शनिवार, 26 दिसंबर 2020

(“षष्टमोल्लास” ७६/७८)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ७६/७८)
*बोले नहीं, कहा सो करिये,*
*दनाई खाई इहां ही मरिये ।* 
*अबै राव को दयों हि श्रापू,*
*जिन भरमाये, बाकौ पापू ॥७६॥* 
तब राणियों ने विचार किया, राजा बोलते नहीं है अब क्या करना चाहिये । तब निश्‍चय किया कि जहर खाकर पछाड़ खाकर यहां ही मर जाना चाहिये । और अब राजा को भी श्राप दे देना चाहिये और जिसने राजा को भरमाय बहकाया उसको हमारे मरने का सारा पाप लगेगा ॥७६॥ 
*राणीया जहर खाकर मर गईं* 
*दनाई लेई सबै मुखडारा,*
*अवनी ऊपरि खाई पछारा ।* 
*मानो भई चींटिन की ढेरी,*
*रोस जु कीनौं स्वामी केरी ॥७७॥* 
सब राणियों ने विष लेकर मुख में डाल लिया और उसे खाते ही सब पृथ्वी पर पछाड़ खा खा कर गिर गई । वे ऐसी लग रही थी मानों चींटियों की ढेरी होवे । उन्होंने स्वामी दादूजी के प्रति भी रोष क्रोध नाराजगी प्रकट की । उसको स्वामीजी जान भी गये क्यों वे तो अन्तर्यामी थे ॥७७॥ 
*अंतरजामी सब ही सूझै,*
*हरिके जन सौं कहु नां गूझे ।* 
*पर उपगारी दीन दयालू,*
*वेगही कीनां आइ संभालू ॥७८॥* 
स्वामी दादूजी अन्तर्यामी हैं अत: उनको सब घटना का ज्ञान हो गया । हरि के भक्तों से कुछ भी छिपा नहीं रहता क्योंकि वे स्वयं हरि रूप होते है । दीन दयालु स्वामी जी तो परोपकारी महान संत हैं, अत: वे शीघ्र जाकर उन राणियों की संभाल कर लेंगे ॥७८॥ 
(क्रमशः)

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