मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ४१/४४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ४१/४४*
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कहि जगजीवन रांमजी, डूबत कर गहि काढि ।
पांच पच्चीस र तीन हरि, बिरह अगनि में दाढि३ ॥४१॥
(३. दाढि=जला दे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु पांच ज्ञानेन्द्रियां व पच्चीस उनकी विधियां या सहायिकाओं व तीन गुण सत्व रज तम इन सब में डूब रहे हैं आप अपना हाथ देकर उबारिये व फिर कृपा करके आपके विरह में जला दें ।
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कहि जगजीवन रांमजी, जुग जुग हरिजन जोग ।
जप तप संजम नांम हरि, जुगति प्रेम रस भोग ॥४२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि युग युग हरि के जन ही इस योग्य है कि वे जप करें तप करें सयंम निभायें और इस युक्ति से प्रेमरस का आनंद लें ।
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एक आइ सुख ऊपजै, एक आइ दुख होइ ।
कहि जगजीवन भगति रस, भुगति भ्रमै नर लोइ ॥४३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के आने से सुख होता है व संसार के आने से दुःख होता है । अतः हे जीव भक्ति रस का भोग करे जो संसार में रह कर भी सुख देती है ।
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रांम रांम कहि जीविये, भाव भगति सब ठांम ।
कहि जगजीवन हरि कहै, साध सुणौं गहि नांम ॥४४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम स्मरण कर जीवन जीयें बाकि भाव भक्ति सब यथा स्थान है । प्रभु कहते हैं साधु जन की वाणी सुनें व प्रभु का नाम लें ।
(क्रमशः)

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