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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ८५/८७)
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*ऐसे राणी कहै सु बैन,*
स्वामी चितये सीतल नैन ।*
*सैल जु कीजे सब ब्रह्मंडा,*
*भोजन दीजे रोटी खंड़ा ॥८५॥*
जब राणी ने उक्त वचन कहै तब दादूजी महाराज ने उसकी तरफ शीतल दृष्टि से देखा और बोले संत तो सब ब्रह्मंड में ही भ्रमण करते हैं । उनको सभी लोग रोटी टुकड़ा रूप में भिक्षा देते हैं । अथवा सत्कार से रोटी खांड देते हैं ॥८५॥
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*भांति भांति का पीवे नीरू,*
*केवल हृदौ सुखी सरीरू ।*
*जीवन मुक्ति सु फिरे अतीतू,*
*जप तप संजय इंद्री जीतू ॥८६॥*
संत देश में भ्रमण करते हुये नाना भांति का जल पान करते हैं । एक परब्रह्म के चिन्तन से ही उनका हृदय एवं शरीर सुखी रहता है । वे जप तप संयमादि से इन्द्रियों को जीतते हैं । और वे गुणातीत संत जीवन्मुक्त होकर हरि निर्देशानुसार फिरते हैं ॥८६॥
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*आसा तृष्नां चिंता नांही,*
*मुक्ति सरूपी है विस्व मांही ।*
*साध संगति जो कोई करई,*
*पीछे जगत माया क्यूं परई ॥८७॥*
संतों के मन में आशा-तृष्णा और जगत का चिंतन नहीं होता, वे जीवन मुक्त होकर विश्व में रहते हैं । जो कोई भी संतों की संगति करता है उसे सत्संग के प्रभाव से ब्रह्म ज्ञान हो जाता है । फिर वे जगत चक्र से व माया से निकल जाते हैं ॥८७॥
(क्रमशः)

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