रविवार, 20 दिसंबर 2020

= *स्वांग का अंग १३२(७३/७६)* =

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*दादू हंस परखिये, उत्तम करणी चाल ।*
*बगुला बैसे ध्यान धर, प्रत्यक्ष कहिये काल ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*स्वांग का अंग १३२*
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बाँने१ बानी२ सौं रंगे, काचा काया कुंभ । 
रज्जब रति न ठाहरै, परसत अबला३ अंभ४ ॥७३॥
कच्चे घड़े को भस्म२ से रंग दिया जायेगा तो वह जल४ से स्पर्श होने पर क्षण भी नहीं ठहर सकेगा, वैसे ही असाधु शरीर को भेष१ द्वारा साधु बना दिया जायगा तो नारी३ स्पर्श से उसकी साधुता क्षण भर भी नहीं ठहर सकेगी । 
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मंझे१ मावो२ महिं किया, उतैं३ तन जरपोसि४ । 
रज्जब रचि सु मतिन्ह५ के, गुझी६ गाल्हि७ सुण्योसि८ ॥७४॥
भीतर१ मन को तो प्रभु२ प्राप्ति के योग्य नहीं बनाया किन्तु ऊपर३ शरीर को जरी४के वस्त्र पहन कर खूब सजाया है और बुद्धि५ के द्वारा रची हुई गूढ६ बातें७ भी सुनाते८ हैं किंतु जब तक मन ठीक न हो तब तक क्या मुक्ति हो सकती है ?
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चाम दाम सम स्वांग सब, ता में फेर न सार । 
रज्जब तजे सु जौहर्यों, लेसे१ मुग्ध२ गँवार३ ॥७५॥
सभी भेष चमड़े के दामों के समान हैं, इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं यह सार बात है । जैसे परीक्षक जौहरी तो चमड़े के रुपयों को नहीं लेते त्याग देते हैं किन्तु मूर्ख२ ले लेते हैं, वैसे ही परीक्षक साधक तो भेषधारी को संत मानकर ग्रहण नहीं करते किंतु अनजान३ लोग भेष से ही संत मानकर संत रूप से ग्रहण कर लेते१ हैं । 
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दर्शन१ दिल बैठै नहीं, पाखंड पड़ै न प्राण । 
रज्जब राता राम सौं, समझ्या संत सुजाण ॥७६॥
जिस प्राणी का मन भेष१ में संतोष मानकर नहीं बैठता, पाखंड में नहीं पड़ता, निरंतर राम में अनुरक्त रहता है वही रहस्य को समझा हुआ बुद्धिमान संत है ।
(क्रमशः)

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