गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

*प्रेम का एक बिन्दु*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ ।*
*दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ सारग्राही का अंग)*
================
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
मणि चुपचाप सिर झुकाए हुए हैं । श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “उनके प्रेम का एक बिन्दु भी यदि किसी को मिल गया तो कामिनी=कांचन अत्यन्त तुच्छ जान पड़ते हैं । जब मिश्री का शरबत मिल जाता है, तब गुड़ का शरबत नहीं सुहाता । व्याकुल होकर उनसे प्रार्थना करने पर, उनके नामगुण का सदा कीर्तन करने पर, क्रमशः उन पर वैसा ही प्यार हो जाता है ।”
.
यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो कमरे के भीतर नाचते हुए टहलने और गाने लगे-
(भावार्थ) - :सुरधुनी के तट पर कौन हरिनाम ले रहा है ? शायद प्रेमदाता नित्यानन्द आए हैं । उनके बिना प्राण कैसे शीतल हों ?”
.
करीब दस बजे होंगे । रामलाल ने कालीमन्दिर की नित्यपूजा समाप्त कर दी है । श्रीरामकृष्ण माता के दर्शन करने के लिए कालीमन्दिर जा रहे हैं । साथ मणि भी हैं । मन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण आसन पर बैठ गए । माता के चरणों पर दो-एक फूल उन्होंने अर्पित किए । अपने मस्तक पर फूल रखकर ध्यान कर रहे हैं । अब गीत गाकर माता की स्तुति करने लगे-
“हे शंकरि, मैंने सुना है तुम्हारा नाम भवहरा भी है । इसीलिए माँ, मैंने तुम्हें अपना भार दे दिया है, - तुम तारो चाहे न तारो ।’............
.
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर से लौटकर अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में बैठे । दिन के दस बजे का समय होगा । अब भी देवताओं का भोग या भोग-आरती नहीं हुई । माता काली और श्रीराधाकान्त के प्रसादी फल-मूल आदि से कुछ लेकर श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा जलपान किया । राखाल आदि भक्तों को भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद मिल चुका है ।
.
श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए राखाल स्माइल की ‘सेल्फ-हेल्प’? (Smile’s Self-help) पढ़ रहे हैं - लार्ड अर्स्किन(Lord Erskine) के सम्बन्ध में ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से) – इसमें क्या लिखा है ?
मास्टर – साहब फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य-कर्म करते थे – यही लिखा है । निष्काम-कर्म ।
श्रीरामकृष्ण – तब तो अच्छा है । परन्तु पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी पुस्तक साथ न रहेगी । जैसे शुकदेव – उनका सब कुछ जिव्हा पर ।
“पुस्तकों और शास्त्रों में शक्कर के साथ बालू भी मिली हुई है । साधु शक्कर भर का हिस्सा ले लेता है, बालू छोड़ देता है । साधु सार पदार्थ लेता है ।”
शुकदेवादि का नाम लेकर क्या ठाकुर अपनी अवस्था समझना चाहते हैं ?
.
वैष्णवचरण कीर्तनिया(कीर्तन गानेवाले) आये हुए हैं; उन्होंने ‘सुबोल-मिलन’ नाम का कीर्तन गाकर सुनाया ।
कुछ देर बाद रामलाल ने थाली में श्रीरामकृष्ण के लिए प्रसाद ला दिया । प्रसाद पाकर श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम करने लगे ।
रात में मणि नौबतखाने में सोये । श्रीमाताजी जब श्रीरामकृष्णकी सेवा के लिए आती थीं तब इसी नौबतखाने में रहती थीं । कुछ मास हुए वे कामारपुकुर गयी हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें