गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ ।*
*पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु ---------उन्नति
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एक न्यारया मार्ग में पृथ्वी शोध कर रहा था, उधर होकर वहां का राजा निकला और न्यारिये को देखकर मंत्री से पूछा - "यह क्या कर रहा है ? मंत्री - "भूमी में पड़े हुये पैसे आदि खोज रहा है ।" राजा ने उस पर दया करके उसकी दृष्टि चुराकर उसके आगे एक बहुमुल्य रत्न डाल दिया । वह न्यारिये को भी मिल गया और उसे ज्ञात भी हो गया कि यह बहुमुल्य रत्न है किन्तु फिर भी उसने भूमि में खोजना नहीं छोड़ा । 
फिर एक दिन उसी राजा ने उसे उसी कार्य लगा देखकर पूछा - "अमुक दिन तुझे क्या मिला ? न्यारिया - "बहुमुल्य रत्न" राजा - "तो फिर भी क्यों पृथ्वी खोज रहा है ? न्यारिया - "महाराज ! जिस कार्य में ऐसे अमुल्य रत्न मिले, वह कार्य क्या छोड़ने का होता है ? न्यारिये की उपर्युक्त सारगर्भित बात सुनकर राजा हर्षित हो चुपचाप चले गये ।
साधारण जन भी न तजे, निज उन्नति उपाय ।
न्यारया सोधत ही रहा, भूमि सदा मन लाय ॥७५॥

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