सोमवार, 28 दिसंबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन अंध ।*
*दादू मुक्ता छाड़ कर, गल में घाल्या फंद ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साच का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु ---------शौच
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एक शेखचिल्ली ने खेत बोया था, उसमें एक छप्पर भी बनाया था, जब छप्पर तैयार हो गया, तब उसने यह सोचकर कि जिस स्थान में इसके थम्भा है, वहां से तो नहीं गिरेगा किन्तु अन्य स्थान से गिर गया तो क्या किया जायेगा ? सब छप्पर में लकड़ियों के थम्ब लगा दिया । एक मनष्य खड़ा रह सके, इतनी भी जगह नहीं छोड़ी । 
एक दिन वर्षा आते देख कर कुछ पथिक दौड़कर छप्पर के पास आये तो देखा कि छप्पर के बाहर बैठा मनुष्य भीग रहा है । पथिक - भाई हम छप्पर में बैठकर वर्षा से आये हैं किन्तु तुम छप्पर के पास बैठे हुये भी क्यों भीग रहे हो ? शेखचिल्ली - यदि छप्पर में बैठने की जगह होती तो मैं दो - चार थम्भे और ना लगा देता । ऐसे ही प्राणी के हृदय में जब तक कामादि दोष भरे हैं तब तक उसमें दैवीगुण प्रवेश नहीं करते ।
हृदय शुद्ध बिन मनुज में, दैवीगुण नहिं आत ।
शेखचिल्ली के छप्पर में, पथिक न एक समात ॥१८१॥

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