बुधवार, 23 दिसंबर 2020

(“षष्टमोल्लास” ७०/७२)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ७०/७२)
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*उष्णकाल रहते खस खाने,*
*सीतल जल करते रस पाने ।* 
*पावस रितु मैं खूब अटारी,*
*कौन गति वन मांहि तुम्हारी ॥७०॥* 
हे राजन् ग्रीष्म ॠतु में आप खश की टाटी लगे महल में रहते थे और शीतल जल और फलों का रसपान करते थे । वर्षा ॠतु में अति सुन्दर अटारी झरोखों में रहते थे । अब वन में तुम्हारी क्या गति होती होगी अर्थात् उक्त सुख के विपरीत दु:ख ही होंगे ॥७०॥ 
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*सीतकाल में रूई जु लेते,*
*नीचे ऊपरि सेवक देते ।* 
*पाट पटंवर करो विलासू,*
*कोमल वसन फूलन में वासू ॥७१॥* 
शीतकाल में रूई के गद्दे पिलंग पर बिछाये जाते थे । सुन्दर तकिये लगाये जाते, ऊपर रजाई औढाई जाती थी ये सब कार्य सेवक करते थे । सुन्दर रेशमी वस्त्र पहनकर एवं कोमल वस्त्रासनों पर बैठकर सुगंधित फूलों में रहते थे । अब वन में वे कहां है ॥७१॥ 
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*एक पैंड नहीं चले पियादे,*
*अबै पीव दिन कैसे विहांदे ।* 
*नंगे पांइन क्यूं दु:ख सहिये,*
*वन में अकेले कैसे रहिये ॥७२॥*
आप एक पैड कदम भी पैदल नहीं चलते थे, वन में आपके पास सवारी कहां रहेगी । पति देव आप उक्त दु:खों में पड़े हुये अपने जीवन के दिन कैसे व्यतीत करेंगे । नंगे पैर पैदल चलने का दुख आप केसे सह सकेंगे । रात्रि में आपके साथ सवा चार सौ राणियां रहती थी, मणि दीपकों का सुन्दर प्रकाश महल में रहता था अब आप अंधकार पूर्ण इस भयंकर वन में कैसे रह सकेंगे । अत्यन्त कठिन कार्य है ॥७२॥
(क्रमशः)

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