शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

*व्याकुल देखि भरे प्रभु आँखिन*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*विपति भली हरि नाम सौं, काया कसौटी दुख ।*
*राम बिना किस काम का, दादू संपति सुख ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
=================
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*कुन्ती की पद्य टीका* 
*प्रीति न देखत हूं पिरथा बिन,*
*भूत रु देव विपत्ति न माँगै ।*
*चाहत है मुख लाल हि देखन,*
*हीहु दयालु कि द्यौ वन बागै ॥*
*व्याकुल देखि भरे प्रभु आँखिन,*
*फेरि लिये धन प्राण सु जागै ।*
*अन्तर ध्यान भये सुन कानन,*
*ता छिन ही मछ ज्यों तन त्यागै ॥६८॥*
कुन्ती देवी आदर्श आर्य-नारी और भगवान् की भक्त थीं । यह पांडुओं की माता, श्रीकृष्ण भगवान् की बुआ और वासुदेव की सगी बहिन थीं । कुन्तीभोज को गोद दी गई थी । जन्म से नाम पृथा था, कुन्तीभोज के यहां लालन-पालन होने से कुन्ती नाम से विख्यात हुई थीं । पृथा बिना अन्य किसी भी भूत-प्राणी देवता आदि में भी प्रभु-प्रीति का ऐसा रूप नहीं देखा जाता जो प्रभु प्रसन्न होकर वर देने को कहें- और माँगने वाला भक्त विपत्तिरूप वर माँगे किन्तु कुन्ती ने प्रभु से विपत्ति ही माँगी थी । 
.
श्रीकृष्ण ने कहा- विपत्ति क्यों माँगती हो ? कुन्ती बोली-“विपत्ति के समय तो आप हमारे पास रहते हैं अतः आपका दर्शन होता रहेगा ।” वह भगवान् का मुख कमल निरंतर देखना चाहती थीं । इसी से कहा- आप हम पर दयालु होकर हमें निवास तो चाहे वन, बाग तथा नगर आदि कहीं का भी दें किन्तु अपना दर्शन सदा देते रहें । 
.
कुन्ती को प्रेम से व्याकुल देखकर श्रीकृष्ण के नेत्रों में भी प्रेमाश्रु झलक आये । कुन्ती ने अपने प्राण तथा धन रूप श्रीकृष्ण को प्रीति से सानुकूल करके अपने हृदय रूप स्थान में ही रक्खा था अर्थात् निरंतर भगवान् का ध्यान करती रहती थीं ....
.
तथा भगवान् श्रीकृष्ण का परम धाम गमन अपने कानों से सुनकर उसी क्षण जैसे जल बिना मच्छी प्राण त्याग देती हैं वैसे ही अपने शरीर को त्याग दिया था । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें