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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ८८/९०)
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*श्री दादू जी के ब्रह्म ज्ञान से जामण मरण मिट जाता है*
*जामण मरण मिटे तिन दोई,*
*उनकी शरणि मुक्ति सब कोई ।*
ऐसौ ज्ञान दीया अवीनासी,*
*ताहू की पुनि दुरमति नासी ॥८८॥*
जो संतों की शरण में आता है उनके उपदेश में उसका जन्म मरण का चक्र समाप्त हो जाता है । इस प्रकार उस अविनाशी ब्रह्म का ज्ञान दादूजी ने राणी को दिया उससे उसकी दुर्बुद्घि नष्ट हो गई और उसने स्वामी जी में अपनी श्रद्घा भक्ति प्रकट की ॥८८॥
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*दादूजी की कृपा से राणी की बुद्घि निर्मल हो गई*
*भई अधीन सु चरनों मांहीं,*
*चित्त सौं स्वामी बिसरे नांहीं ।*
*हमकौं स्वामी आज्ञा दीजै,*
*तुम्ही कहौ सोई अब कीजै ॥८९॥*
फिर वह राणी दादूजी महाराज के चरणों में प्रणाम करके दादूजी के अधीन हो गई । अर्थात् उनके उपदेशानुसार भगवद् धर्म में प्रवृत होने के लिये सहमत हो गई और अब तो वह दादूजी का ही ध्यान करने लगी ॥८९॥
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*चंचल वृति अब गई हमारी,*
*भई जु कृपा देव मुरारी ।*
*होई नहीं हमसे घरवारू,*
*विसरि गई सकल संसारू ॥९०॥*
राणी ने कहा हमारी सांसारिक चंचल वृति सब समाप्त हो गई है । यह सब आपकी व देव मुरारी की कृपा से ही हुआ है । अब हमसे घर वार का सांसारिक कार्य नहीं होता और हम लोग संसार के सारे क्रिया कलाप को भूल गये हैं ॥९०॥
(क्रमशः)

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