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*नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण ।*
*दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ सुन्दरी का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(३)
*हरिकथा-प्रसंग*
सन्ध्या हो गयी । श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे हुए जगन्माता का चिन्तन कर रहे हैं । क्रमशः मन्दिर में देवताओं की आरती होने लगी । शंख और घण्टे बजने लगे । मास्टर आज रात को यही रहेंगे ।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से ‘भक्तमाल’ पढ़कर सुनाने के लिए कहा । मास्टर पढ़ रहे हैं ।*(यह बंगला का भक्तमाल है । छन्दोबद्ध है । यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है ।)
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“जयमल नाम के एक शुद्धचित्त राजा थे । भगवान् श्रीकृष्ण पर उनकी अचल प्रीति थी । नवधा भक्ति के यजन में वे इतने दृढ़निष्ठ थे कि पत्थर पर खींची हुई रेखा की तरह उसका ल्हास न हो पाता था । वे जिस विग्रह का पूजन करते थे उसका नाम श्यामलसुन्दर था । श्यामलसुन्दर को छोड़ वे और अन्य किसी देवी-देवता को मानो जानते ही न थे उन्हीं पर उनका चित्त लगा रहता था । सदा दृढ़ नियमों से वे दस दण्ड दिन चढ़ते तक उस मूर्ति की पूजा किया करते थे । अपने पूजन में वे इतने दृढ़निश्चय थे कि चाहे राज्य और धन का नाश हो जाए, चाहे वज्रपात हो, तथापि पूजा के समय किसी दूसरी ओर ध्यान न देते थे ।
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“इस बात की खबर उनके एक दूसरे प्रतिस्पर्धी राजा के पास पहुँची । उसने सोचा, यह तो शत्रु को पराजित करने का एक उत्तम उपाय हाथ आया । जिस समय राजा जयमल पूजन के लिए बैठे थे उसी समय उसने उनके राज्य पर आक्रमण कर युद्ध की घोषणा कर दी । राजा की आज्ञा बिना सेना युद्ध नहीं कर सकती । अतः राजा जयमल की सेना उनकी आज्ञा की राह देखती रही । तब तक शत्रुओं ने उनका किला घेर लिया । तथापि इन्होंने उस समय युद्ध की ओर ध्यान ही नहीं दिया, निरुद्ध होकर पूजन करते रहे ।
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इनकी माता सिर पटकती हुई पास आकर उच्च स्वर से रोदन करने लगी । विलाप करते हुए उसने कहा कि अब जल्दी उठो, नहीं तो सब कुछ चला जाएगा; तुम तो ऐसे हो कि तुम्हारा इधर ध्यान ही नहीं है – शत्रु चढ़ आया – अब किला तोडना ही चाहता है । महाराज जयमल ने कहा, ‘माता ! तुम क्यों दुःख कर रही हो ? जिसने यह राज-पाट दिया है, वह अगर छीन ले तो हमारा इसमें क्या ! और अगर वह हमारी रक्षा करे, तो वह शक्ति किसमें है जो हमसे ले सके? अतएव हम लोगों का उद्यम तो व्यर्थ ही है ।’
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“इधर श्यामलसुन्दर ने घोड़े पर सवार हो अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध की तैयारी आकर दी । अकेले ही भक्त के शत्रुओं का संहार करके घोड़े को अपने मन्दिर के पास बाँधकर श्यामलसुन्दर जहाँ के तहाँ हो रहे ।
“पूजा-अर्चना समाप्त होने पर राजा जयमल बाहर आकर देखते हैं कि सामने उनका घोड़ा पसीने से तर हो हाँफता खड़ा हैं । वे पूछने लगे, ‘मेरे घोड़े पर कौन सवार हुआ और इसे यहाँ बाँध गया ?’ सभी कहने लगे कि यह तो हम कुछ भी नहीं जानते । राजा में मन में सन्देह हुआ और यही सोचते हुए वे सेनासहित युद्धभूमि की ओर बढ़े । जाकर उन्होंने देखा कि सारी शत्रुसेना रणभूमि में लोट रही है – केवल शत्रुपक्ष का राज भर बचा है । विस्मित होकर राजा जयमल इसका कारण पूछने लगे ।
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इतने में वह प्रतिस्पर्धी राजा उनके समीप आया और हाथ जोड़कर विनती करने लगा । वह बोला, ‘आपके एक सिपाही ने अकेले ही इतना आश्चर्यजनक युद्ध किया कि उनके सामने कोई टिक न सका । वह अवश्य ही त्रिलोकविजयी है । महाराज, मैं आपका धन या राज्य नहीं चाहता । बल्कि आप चलकर मेरा भी राज्य ले लें । परन्तु मुझे इतना बताइये कि वह सिपाही कौन था? केवल एक बार दर्शन देकर उसने मेरा मन हर लिया है ।”
“जयमल को समझने में देर न लगी कि यह सब श्यामलसुंदरजी का ही खेल है । यह मर्म जानते ही प्रतिद्वन्द्वी राजा जयमल के चरण पकड़कर स्तव करने लगे और कहने लगे कि जिनके कारण मुझ पर कृष्ण की कृपा हुई उन आपके चरणों में मैं शरण लेता हूँ – कृपा कीजिए कि यह श्यामल सिपाही मेरा स्वीकार करे ।”
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पाठ समाप्त होने के बाद श्रीरामकृष्ण मास्टर के साथ बात कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण – इन बातों पर तुम्हारा विश्वास होता है ? – घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सेनानाश किया था; इन सब बातों पर ?
मास्टर – भक्त ने व्याकुल होकर उन्हें पुकारा था । इस पर विश्वास होता है । श्रीभगवान् को उसने ठीक ठीक सवार करते देखा था या नहीं, यह सब समझ में नहीं आता । वे सवार होकर आ सकते हैं, परन्तु उन लोगों ने उन्हें ठीक ठीक देखा था या नहीं, इस पर विश्वास नहीं जमता ।
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श्रीरामकृष्ण(सहास्य) – पुस्तक में भक्तों की अच्छी कथाए लिखी हैं, परन्तु हैं सब एक ही ढर्रे की । जिनका दूसरा मत है, उनकी निन्दा लिखा है ।
(क्रमशः)

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