बुधवार, 23 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ४६/५०

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ४६/५०)
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*॥ मरण भय निवारण ॥* 
*दादू मरणे थीं तूं मत डरै, सब जग मरता जोइ ।* 
*मिल कर मरणा राम सौं, तो कलि अजरावर होइ ॥४६॥* 
*दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा अंत निदान ।* 
*रे मन मरणा सिरजिया, कहले केवल राम ॥४७॥* 
*दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा पहुँच्या आइ ।* 
*रे मन मेरा राम कह, बेगा बार न लाइ ॥४८॥* 
*दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा आज कि काल ।* 
*मरणा मरणा क्या करै, बेगा राम सँभाल ॥४९॥*
*दादू मरणा खूब है, निपट बुरा व्यभिचार ।* 
*दादू पति को छाड़ कर, आन भजै भरतार ॥५०॥* 
इस सातों साखियों में श्री दादू जी महाराज मृत्यु के भय को दूर कर रहे हैं कि जन्म लेने वालों की मृत्यु निश्चित है तो फिर हमारी मृत्यु कैसे नहीं होगी । इसलिये मृत्यु के भय को त्याग कर जो परमात्मा का साक्षात्कार करके मरता है, वह देवताओं से भी श्रेष्ठ है और जन्म के साथ ही जब मृत्यु पैदा हो जाती है तो वह सदा ही हमारे साथ ही रहती है । चाहे आज हो जावे या सौ वर्ष के बाद हो । अतः मृत्यु का भय त्याग कर हरि भजन करना चाहिये और भजन भी हरि का ही करो, न कि देवताओं का, क्योंकि हरि सबका स्वामी है । 

अपने स्वामी को छोड़कर दूसरे का भजन व्यभिचार के तुल्य है और देवता तो स्वयं माया के पाश से बंधे होने से मोक्ष नहीं दे सकते तथा देवता तो स्वयं माया के पाश में बंधने के कारण भगवान् की अपेक्षाहीन ही हैं । 

उपासना तो सर्वोत्कृष्ट की ही करनी चाहिये । ऐसा सिद्धान्त है, और मृत्यु भी कर्म का ही कल है, वह भोगना ही पड़ेगा । भय से भागने पर कर्म फल नष्ट नहीं होते । 

यह शरीर क्षणभंगुर है फिर इसके विनाश से क्या डरना ? क्योंकि डरने से मृत्यु टलती तो नहीं है । वह तो अवश्य होने वाली है और जो हरि को भजकर मरते हैं वे तो उसके लोक में जाकर आनन्द लेते हैं । 

अतः कौन इस संसार में दीर्घकाल तक जीने की इच्छा करेगा और मृत्यु तो हरि प्राप्ति का एक साधन है जो भजन करके मरता है वह उनके लोकों में जाकर हरि रूप हो जाता है । अतः अनिवार्य मृत्यु के भय को त्याग कर सबको हरि भजन ही करना चाहिये । 

अथवा अहंकार का त्याग ही मरण है । क्योंकि जीव अहंकार से ही मरता है जन्मता है । यदि जीव भाव को त्याग दे तो यह ब्रह्म स्वरूप ही है । अतः अहंकार को त्याग कर हरि भजन से आनन्द करो । व्यर्थ में ही अपनी कृपणता से संसार के दुःखों को सहते हैं ।
(क्रमशः)

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