गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

*प्रेम-ध्वजा चित्रकेतु पुरानन*

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*साधु कंवल हरि वासना, संत भ्रमर संग आइ ।*
*दादू परिमल ले चले, मिले राम को जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*समुदाई पद्य टीका* 
*नाम कुखार अपत्ति१ सु मैत्रेय,**राघवदास बखान कर्यो है ।*
*कृष्ण कही मम भक्त विदूर जु,**उपदेश हि भाव भर्यो है ॥*
*प्रेम-ध्वजा चित्रकेतु पुरानन,**दूसर देह पलट्टि बर्यो है ।*
*ध्रू अकरूर बड़े प्रिय उद्धव,**पत्रन पत्रन नाम धर्यो है ॥६७॥*
मैत्रेयजी- कुषारव के पुत्र१ कौषावर नाम वाले मैत्रेयजी का राघवदासजी ने कथन किया है । आपकी माता का नाम मित्राजी था इसीसे इनका नाम मैत्रेय हुआ, आप पराशर के शिष्य थे । प्रभास क्षेत्र में भगवान् श्री कृष्ण ने उद्धव और मैत्रेयजी को ज्ञानोपदेश किया था तब कहा था- यह उपदेश विदुरजी को सुनाना वे मेरे भाव प्रेम से पूर्ण हृदय वाले हैं । उद्धव जी से यह समाचार सुनकर विदुरजी मैत्रेयजी के पास गये तब वे बड़े प्रसन्न हुये और जो भगवान् ने उपदेश किया था वही मैत्रेयजी ने विदुरजी को सुनाया था, जो श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्द के चौथे अध्याय से आरंभ होता है । मैत्रेयजी श्रीकृष्ण के परम कृपा पात्र थे । 
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चित्रकेतु- शूरसेन देश के राजा चित्रकेतु को और तो सर्व सुख थे किन्तु बहुत-सी रानियाँ होने पर भी पुत्र न था, इस कारण वे व्यथित रहा करते थे । एक बार अंगिरा ऋषि सदाचारी भगवद्भक्त राजा चित्रकेतु को तत्वज्ञान देने पधारे थे किन्तु ऋषि ने उनमें पुत्र प्राप्ति की प्रबल इच्छा देखी, तब यह सोच कर कि पुत्र वियोग से व्यथित होगा तब ही इसे वैराग्य होने पर तत्वज्ञान होगा । राजा की प्रार्थना से त्वष्टा देवता का यज्ञ किया और यज्ञ से बचा अन्न राजा को देकर कहा- इसे तुम किसी रानी को दे दो । इस से पुत्र होगा किन्तु वह हर्ष और शोक दोनों देगा । 
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उस अन्न को खाकर एक रानी गर्भवती हुई, उससे पुत्र हुआ । पुत्र-प्रेम वश पुत्रवती रानी से राजा अधिक प्रेम करने लगे । तब अन्य सब रानियों ने मिलकर सौतिया डाह से पुत्र को विष दे दिया । पुत्र की मृत्यु के शोक से राजा पागल-से हो गये । तब राजा के पास देवर्षि नारद के साथ महर्षि अंगिरा आये । राजा को ज्ञानोपदेश देकर सचेत किया । 
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नारद ने मृत पुत्र को जीवित करके कहा- ये तुम्हारे पितादि दुःखी हैं तुम इनके पास रहो । उसने कहा- मैं किसका पुत्र हूँ और ये किसके पिता है । अपने कर्मों को भोगने के लिए जीव नाना योनियों में भटकता है और अपनी भावना से ही दुःखी सुखी होता है । ये मुझे पुत्र मान कर रो रहे हैं, शत्रु मानकर प्रसन्न क्यों नहीं होते? आत्मा तो न जन्मता है और न मरता है, ये क्यों रो रहे हैं ? यह कह कर जीवात्मा चला गया । उसकी बातों से सबका मोह दूर हो गया । 
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नारदजी ने राजा को भगवत् प्राप्ति का साधन बताया । शेष जी ने भी राजा को उपदेश दिया था । चित्रकेतु तपोबल से इच्छानुसार घूमा करते थे । एक दिन विमान द्वारा आकाशमार्ग से जा रहे थे तब मुनियों की सभा में पार्वती जी को शिवजी की गोद में बैठा देखा । इसे अनुचित जानकर आलोचना की तब शंकरजी ने तो कुछ न कहा किन्तु पार्वतीजी ने शाप दिया-“तू बड़ा अविनीत हो गया है अतः भगवान् के चरणों में रहने योग्य नहीं है, असुर योनि में जन्म ग्रहण कर ।” शाप सुनकर राजा डरे नहीं, न उन्हें असुर योनि में जाने से दुःख ही हुआ । वे जानते थे भगवान् तो सर्व व्यापक हैं, चाहे कहीं भी रहो भगवान् के तो पास ही रहूँगा । 
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पार्वतीजी को प्रणाम करके शाप स्वीकार कर लिया । शाप देने की योग्यता होने पर भी पार्वतीजी को शाप नहीं दिया । और कहा-“मैं शाप से छूटने के लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ । आपको मेरे वचन बुरे लगे, इसके लिये आप मुझे क्षमा करें ।” फिर राजा विमान पर बैठकर चले गये । शंकरजी ने पार्वतीजी को कहा-“मुझे तो भगवद् भक्त राजा पर क्रोध नहीं आया किन्तु आपने तो शाप दे ही दिया । वे तो बड़े समदर्शी हैं शाप के योग्य तो नहीं थे ।” चित्रकेतु प्रभु-प्रेम की तो ध्वजा रूप ही हैं, यह पुराणों में प्रसिद्ध ही है । देखो ! वे दूसरा अर्थात् वृत्रासुर का शरीर बदल कर भी प्रभु-प्रेम में बढ़े ही थे । ध्रुव, अक्रूर और उद्धव ये भक्त प्रभु को बहुत ही प्रिय हैं, पुराणों के पृष्ठ-पृष्ठ पर अर्थात् अनेक पृष्ठों पर इनके नाम और यश अंकित हैं ।
(क्रमशः)

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